Sunday, 10 December 2017

भूलभुलैया

कल रात मैंने उसे आख़िरी मेसेज़ किया था | “मैं ग्वालियर आ रहा हूँ |”, यात्रा की वज़ह बनी- मेला घूमना | मेरे लिए मेला देखना सचमुच एक बहाना था | शायद उसके लिए मेरी यात्रा यही थी | पूरी रात ठीक ढंग से नींद नहीं  आई, ‘उत्सुकता सोने नहीं देती, जगाए रखती है’, हमेशा | उस वक़्त मेरे भीतर के भावों में उत्सुकता चरम पर थी सो रात भर मैं सो न सका | मुझे बस सुबह का इंतज़ार था | रात बीत गई | सुबह हो चली थी पर मेरी ट्रेन नौ  बजे थी | मुझे और इंतज़ार करना था अभी | कमरे में, मैं और नहीं ठहर सका इसलिए ट्रेन के समय से दो घंटे पहले ही स्टेशन की और चल दिया |

मेरी ट्रेन आने में अभी दो घंटे का समय था | इसलिए मैंने स्टेशन के एक कोने को अपना साथी बनाया और उस चुप्पी से बातचीत करने लगा जो वहाँ थी, उस कोने में | हर स्टेशन पे एक चुप्पी वाला कोना होता है जो मुझ जैसे लोगों से बतियाने के लिए ही होता है | पर हर आदमी उस कोने को नहीं जानता मैं जानता हूँ क्योंकि मुझे हमेशा ही ऐसे कोनों की ज़रूरत पड़ती है | शोर से मुझे बहुत चिढ़ है |

स्टेशन पर तमाम यात्री बैठे थे | मेरी उत्सुकता मुझे बैठने नहीं दे रही थी इसलिए बीच बीच में, मैं स्टेशन पर टहल आता था | थोड़ा टहल लेने के बाद मैं अपना कोना पकड़ लेता और चुप्पी से बतियाने लगता | इस बातचीत में दो घंटे का समय बीत गया मुझे पता ही नहीं चला | समय के गुज़रने का अंदाज़ा मुझे तब हुआ जब उसका मेसेज़ आया |

“क्या हुआ?, आप आ रहे हो या नहीं?”
“हाँ, आ रहा हूँ ... | स्टेशन पर हूँ |”
“सच्ची?”
“कोई शक..!”
“नहीं, इंतज़ार है | आ जाओ |”

ट्रेन आ चुकी थी | स्टेशन पर बैठे तमाम लोग जो ट्रेन के इंतज़ार में थे सब ट्रेन मैं चढ़ चुके थे | सिवाय मेरे | मैं दुनिया की गति को थोड़ा मध्दिम महसूस कर रहा था, अब और इंतज़ार मुझसे हो नहीं रहा था | मैं चाहता था कि  झट से उसके पास पहुँच जाऊँ | ट्रेन में चड़ने पर एक अलग सी ख़ुशी महसूस हुई | अब मैं चलने लगा था | सफ़र में होना हमेशा ही ख़ुशी में गोते लगाने जैसा होता है |

मेला घूमने के बहाने यह मेरी उससे दूसरी मुलाक़ात होने वाली थी | पर पता नहीं क्यों मुझे लग रहा था की हम मिल ही नहीं पाएंगे | एक अजीब सा भय मेरे भीतर गुज़र रहा था | पहली मुलाक़ात के बाद शायद वह मुझे अब तक भूल भी गई होती अगर फेसबुक नहीं होता | हम हर दिन थोड़ा थोड़ा बतियाते रहते थे | मैंने ही उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी थी | मैं पहली मुलाक़ात के बाद से ही उससे दोस्ती करना चाहता था | वह सबसे अलग महसूस होती थी मुझे | एकदम मासूम और नटखट भी |
मैं उसके एकदम उलट गंभीर और चुप्पी वाला प्राणी | मेरी भीतर की गंभीरता मुझे तुरंत नए लोगों से घुलने मिलने नहीं देती इसलिए मेरे कम ही दोस्त है | पर मुझे संतुष्टि है कि जितने है सच्चे है, अच्छे है, प्यारे है | मेरी गंभीरता से मुझे थोड़ी चिढ़ इसलिए थी क्योंकि इसके कारण मैं ख़ुद को बड़ों सा महसूस करता था मतलब हर काम सोच विचार के | मैं थोड़ा आवारा सा होना चाहता था | ‘शिवांशी’ से मुलाक़ात मेरी आवारगी का जन्म जैसा था और साथ ही अपने बचपने का वापस लौट आने का आभास सा था |

हमारी पहली मुलाक़ात बड़ी यादगार मुलाक़ात थी | मैं नाटक देखने भारत भवन गया था, वह भी आई थी अपनी मौसी के साथ | उसने अपनी सूरत पर मुस्कराहट के साथ मौन ओढ़ा था | तब पहली बार वह मेरे भीतर से गुज़र गई थी और मेरी धङकनों पर अपना नाम लिख गई थी | मैं तो वैसे भी ख़ालीपन लिए घूम रहा था मुझे लगा जैसे वही मेरा इंतज़ार है |

“ट्रेन का शायरन गूंजा, और चल पड़ी | मैंने भागते हुए ट्रेन पकड़ी |”
मैं ट्रेन के दरवाज़े पर खड़ा हो गया | रेल की यात्रा में मुझे सबसे ज्यादा मज़ा आता है दरवाज़े के पास खड़े होकर यात्रा करने में | वहाँ से दुनिया घूमती दिखती है- दूसरी बार मैंने दुनिया को घूमते देखा था जब पहली बार ट्रेन में चड़ा था | पहली बार बचपन के दिनों में- बस से देखा था |

भोपाल से कोई पांच - छः घंटे का सफ़र होगा | यानी पहुँचते पहुँचते शाम होना तय था | मैं पहली बार भोपाल से ग्वालियर का सफ़र तय कर रहा था और मैंने अब तक कम ही यात्राएँ रेल से की है इसलिए यह एक अनूठा अनुभव होने वाला था | पर यह सचमुच किसी सपने के सच होने जैसा था क्योंकि मैं हमेशा से चाहता था कि कोई लड़की मेरे इंतज़ार में हो, ‘यात्रा और इंतज़ार किसी एक ठिकाने पर मिलें कभी- एक साथ |’
मैं कभी प्लानिंग नहीं करता था ऐसा नहीं है पर पिछले दिन सचमुच बिना प्लानिंग के ही ‘बस चलना था, और चल दिया |’ इसलिए अब थोड़ी चिंताएं और दूसरी भी होने लगी थीं |
“जल्दी बताओ किस ट्रेन से आ रहे हो?, और कब तक पहुचोगे?, मैं आपको लेने आ जाऊँगी |’’ – उसका मेसेज़ आया |
मैं चाहता था की वह यह पूछे | उसके यह पूछने से मैं बहुत खुश था | मैंने अनचाहे ही बस कह दिया- “तुम चिंता मत करो, ग्वालियर में मेरे कुछ दोस्त है वह मुझे लेने आ जायेंगे, मैं तुमसे कल मिलूंगा |”

दोस्त ! अरे हाँ, मेरे दोस्त भी तो हैं उस शहर में | इस ख़याल के आने से मुझे थोड़ी उम्मीद मिली | मेरे स्कूल के कई सीनियर वहाँ पढाई कर रहे थे स्पोर्ट कॉलेज में |  मुझे अब से कुछ देर पहले लगा था की मैं कोई बेबकूफ़ी  वाली हरक़त कर रहा हूँ क्योंकि मेरे पास पर्याप्त पैसे भी नहीं है इस यात्रा के लिए | और मैं किसी नए शहर में जा रहा हूँ जहाँ मेरे रहने खाने का कोई ठिकाना नहीं है | अब मैं ख़ुद को थोड़ा आवारा सा महसूस कर रहा था | मुझे यह अनुभूति मज़ेदार लग रही थी | पर अगली चिंता यह थी की जो लोग वहाँ है उनसे कांटेक्ट कैसे किया जाए? क्योंकि किसी का भी नम्बर तो था नहीं | एक पल को उम्मीद फिर टूटती नज़र आ रही थी | यह चिंता मुझे परेशान करती उससे पहले मैंने सोचा की ‘छोड़ो, वहाँ पहुँच के देखेंगे’ !  जो होगा सो निपट लेंगे वैसे भी जिंदगी अनुभव ही तो है और नए नए अनुभवों को जीना ही तो मज़ा है | इसलिए मैंने टाइम पास के लिए फेसबुक खोल लिया | शायद, मेरा दिमाग़ सुस्ता गया था | फेसबुक के ज़रिये किसी का तो कांटेक्ट मिल ही जायेगा, यह मेरे दिमाग़ में पहले क्यों नहीं आया ! पता नहीं | अभी मुझे किसी का नाम ही याद नही आ रहा था की किसे सर्च करूँ? मेरे बैच से वहाँ कोई नहीं था पर मेरे सीनियर थे, वे सभी भी दोस्तों जैसे ही थे | मैंने अपनी फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में खोजना शुरू कर दिया | मेरा खोजना असफल रहा क्योंकि किसी का भी नंबर उनकी प्रोफाइल पे नही था | पर मैंने सबको एक एक मेसेज़ डाल दिया की मैं वहाँ आ रहा हूँ | मुझे उम्मीद थी की कोई न कोई मेरे ग्वालियर पहुँचने से पहले मेसेज़ पड़ लेगा |
इसी बीच शिवांशी का एक मेसेज़ आ गया- ‘मैं कोचिंग जा रही हूँ, वहीं स्टेशन के पास में है | पहुँचते ही मेसेज़ करना | वह संगीत में कोई डिप्लोमा कर रही थी और छोटे बच्चों को पढ़ाने भी जाती थी | मुझे तो वो ख़ुद किसी मासूम बच्ची सी लगती थी | और उसी मासूमियत के पीछे तो मैं खिंचा चला जा रहा था |
उन दिनों मुझे कविता लिखने का नया शौक लगा था | यह अच्छा मौक़ा था | ट्रेन का सफ़र, प्रेमिका की याद और इंतज़ार... सो मैंने अपने फ़ोन में नोट्स खोला, लिखना शुरू किया-

“मैं चाहता हूँ, एक भूलभुलैया हो                                                                
कितना अच्छा हो                                                                                  
मैं और तुम जीवन भर उसमें                                                                    
भटकें, भूलें और खो जाएँ”

पिकिंग.. पिकिंग ...! का साउंड गूंजा | मेसेंज़र का यह साउंड जैसे हमारे प्यार का अकेला गवाह था जो हम दोनों के अलावा हमारे प्रेम को जानता था | उसका ही मेसेज़ होगा मुझे पता था | मुझे लगा की वह लिखेगी कि वह मेरे प्रेम की भूलभुलैया में कैद हो चुकी है और मैं उस तर्ज़ पर अपनी कविता पूरी कर दूंगा पर उसने लिखा-

“मुझे लगता है कि मुझे आज कोचिंग नहीं जाना चाहिए?”
“बिलकुल जाना चाहिए”- मैंने लिखा |
“पक्का..?”
“हाँ...!”
“ठीक है, कोचिंग से फ्री होते ही सीधा स्टेशन | टाटा |”

वह शायद थोड़ी जल्दी में थी | टाटा हमारी बातचीत में जब भी आए तो उसका मतलब होता था की अब लंबे समय तक हमारी बातचीत नहीं होगी | चार पांच घंटे शायद | वैसे हम चौबीसों घंटे एक्टिव रहते थे फेसबुक मेसेंजर पर | हाँ, कभी कभी ऐसे हालात बनते थे कि हम लंबे समय तक इनएक्टिव हो जाते थे | तब हममें से जिसे भी लगता था की वह कुछ घंटो के लिए फ़ोन हाथ में ले ही नहीं पायेगा तब वह “टाटा” बोल देता था | फेसबुक मेसेंज़र इक़लौता पुल था हमारे बीच | ना व्हाट्सएप और ना ही कोई दूसरा चैटिंग एप | यहाँ तक की हमने अब तक अपने कांटेक्ट नंबर भी एक्सचेंज नहीं किये थे | पता नहीं क्यों?, मेरा कभी मन नहीं होता था कि उससे नम्बर मांगू | मेसेंजर पर बात करने से यह विश्वास बना रहता था की बातचीत कभी टूटेगी नहीं | हमेशा थोड़ी थोड़ी होती रहेगी | और मेसेज़ आएगा या जाएगा तब तक कोई नइ बात पैदा हो जाएगी और हम बातचीत करते रहेंगे | फ़ोन के साथ इसकी गारंटी नहीं थी- यह मेरे संदर्भ में है क्योंकि मैं कम ही बातें कर पाता हूँ | उसने मुझसे नम्बर नहीं माँगा इसकी वजह बस वही जानती होगी |
छः बजे के आसपास ट्रेन पहुँच जायेगी | और वह भी कोचिंग से फ्री हो जाएगी | अभी दो घंटे का समय बाक़ी था |
मुझे लगा की मुझे अपना नम्बर तो उसे मेसेज़ कर देना चाहिए | इसलिए मैंने अपना नंबर उसे मेसेज़ कर दिया | इस बीच अनिल भैया का मेसेज़ आ गया |                                                             

“कहाँ है?”
“ट्रेन में |”
“कब प्लान बनाया? पहले बता देता |”
“यार मत पूछो, थोड़ी जल्दबाज़ी में प्लान बना”, “लेने आ जाओ स्टेशन..!”
“अभी मेरे दो मैच हैं | अरे सुन ... तू एक काम कर | टेम्पो चलते है.. स्टेशन से बैठ जाना किसी को भी पूछ के | पास में ही स्पोर्ट्स कोलेज़ है | पांच रूपये लेगा टेम्पो वाला | पहुँच के कॉल करना मैं गेट पर ही मिल जाऊंगा |” 

उन्होने मुझे अपना नंबर दिया और बाय बोलकर इनएक्टिव हो गये | अब मेरी साँसे सामन्य हुई | टिकिट लेने के बाद बचे हुए आठ सौ पचास रूपये को मैंने जेब में टटोला | मन में कहा ‘अब तो बहुत है, रहने को ठिकाना जो मिल गया था  |’ 
मैं सीधा उसके घर जा सकता था | पर सिवाय उसके सब मेरे लिए अज़नबी थे मैं वहाँ नहीं रह सकता था | और वैसे भी मुलाक़ात का मज़ा थोड़े में ही है अगर मैं उसके साथ रहता तो वक़्त की स्पेसिअलिटी चली जाती | और फिर मैंने कह भी दिया था उसे की मेरे दोस्त हैं | सो ऐसे दो चार कारण मैंने अपने मन में बना लिए थे जिसकी वज़ह से में उसके घर में कतई नहीं रुकना चाहता था | और स्पोर्ट्स कॉलेज़ में रुकने का रॉब वापस आकर अपने दोस्तों के बीच झाड़ने की उमंग भी पनप चुकी थी इस बीच | इच्छाह थी सो अलग | रही मेरे महसूस की बात तो पता नहीं कौनसी फीलिंग थी साला समझ में ही नहीं आ रही थी की इस वक़्त क्या गुज़र रहा है भीतर ही भीतर |
कुछ और देर मैं फ़ोन चलाता रहा | काफी समय बीत गया था |

“भाई साइड होना ज़रा”, किसी ने हल्का धक्का देते हुए कहा |
“उतरना है”- मैंने पूछा |
“हाँ |”

अभी स्टेशन आने में कुछ देर थी जिन्हें उतरना था वे यात्री अपना सामान लेकर तैयार हो रहे थे | मैं निश्चिन्त था मुझे लगा की अभी पहुँचने में वक़्त लगेगा पर मैं पहुँच चुका था | वक़्त जो इतना मद्धिम था पता नहीं कैसे वह इतनी जल्दबाज़ी में गुजर गया | “ग्वालियर ...हा !” मैंने गहरी सांस ली और ट्रेन से ऐसे कूदा जैसे किसी पहाड़ से कूद रहा था | ट्रेन के दरवाज़े और सतह के बीच कुछ आठ अंगुल जगह होगी |

मेरी भूख अब अपने चरम पर थी मुझे बिलकुल नहीं पता था की क्या खाना है | खाने का मन नहीं हुआ इसलिए हल्का फुल्का नाश्ता किया | अनिल भैया को कॉल किए बिना ही मैं स्पोर्ट कॉलेज़ चल दिया | शाम ढलना शुरू हो गई थी | स्पोर्ट कॉलेज़ पहुँचकर अपना स्कूल याद हो आया | अपने स्कूल टाइम में, मैं भी टी-शर्ट, शोर्ट में ऐसे ही घूमा करता था जैसे यहाँ बन्दे घूम रहे हैं | अभी दो ही साल हुए हैं मुझे स्कूल से निकले और अब मैं ख़ुद को उस माहौल से कितना अलग पा रहा हूँ | अगर मेरा लगाव रंगमच से नहीं होता तो शायद मैं किसी स्पोर्ट कॉलेज़ में ही होता | और ऐसी ही आवारगी में होता | मैंने अनिल भैया को कॉल किया वह अगले पांच मिनट में आ गए थे मुझे बहुत इंतज़ार नहीं करना पड़ा |
वहाँ से हम सीधे हॉस्टल गए | उनका एक मैच अभी बाक़ी था इसलिए उन्हें जाना पड़ा मैं अकेला हो गया था | मैंने फ़ोन में समय देखा | अभी बीस मिनट और थे छः बजने में | ख़ाली वक़्त हमेशा कविता की तरफ़ इशारा करता है | मैंने अपनी अधूरी कविता को फिर से पड़ा और सोचने लगा की आगे क्या लिखूं ...! मैंने आगे लिखा-

"भूल भुलैया की चुप्पी में                                                                        
कहीं क़ैद हो जाएँ- आवाज़े                                                                      
कितना अच्छा हो जो                                                                                 
मौन हमारा प्रेम हो जाए”

मैं और गहरे में जाकर सोचना चाह रहा था | शायद वह नींद का इशारा था मेरी तरफ़ | मुझे काफ़ी थकान भी हो गई थी | मैं सो गया | उसके बाद मुझे सीधा होश तब आया जब अनिल भैया ने जगाया | साढ़े आठ बजे | डिनर का टाइम हो गया था | हम मेस गए | इस बीच मुझे शिवांशी का ध्यान तो आया पर मैं सिर्फ़ सोच पाया की उससे बात कर लूं | मेसेज़ चेक करने का वक़्त नहीं था | मैं कोई बहुत ज़रूरी काम नहीं कर रहा था पर दोस्तों के बीच, उनकी हमारी बातचीत के बीच फ़ोन आए मुझे कतई पसंद नहीं था | जीवन में चिंतन और दर्शन आ जाने से साथ बड़ा लगने लगता है |

मैस वाला माहौल भी मज़ेदार होता है | ख़ूब चहल पहल और तमाम लोगों का साथ | इस साथ को अपने हॉस्टल के दिनों में कभी नहीं समझा मैंने | मैं कहाँ... कोई नहीं समझता | वहाँ कुछ और सीनियर्स भी आ गये थे अब | लोग बढ़ गए और ख़ूब बातें, किस्से- कहानियां, यादें ताज़ा हो उठीं | वक़्त ठीक वैसे गुज़रा जैसे मैंने चाहा था |      
हम लोग मैस से निकले | अभी सबकी मीटिंग थी इसलिए सब अपने अपने हॉस्टल चल दिए | मैं अनिल भैया के साथ उनके हॉस्टल गया | किसी अनजाने नंबर से फ़ोन आया था मैंने अपना फ़ोन चेक किया तो मुझे पता चला और एक नहीं अलग अलग टाइम पे कई मिस्डकॉल | मुझे बिलकुल अंदाज़ा नहीं था | ट्रेन में पिकिंग पिकिंग का साउंड बार बार ना गूंजे इसलिए तब मैंने फ़ोन साइलेंट किया था और भूल गया था | मैंने कॉल बैक किया किसी लड़की की आवाज़ थी |

“हेलो ...!”
“हेलो ...हाँ कौन?”-मैंने पूछा |
थोड़ी देर चुप्पी |
“हेलो ...मैं धर्मेंद्र बोल रहा हूँ | आपका मिस्ड कॉल देखा इसलिए कॉल बैक किया |
शिवांशी..!”- उसका जवाब आया |

फ़िर थोड़ी देर चुप्पी | अब कौन क्या बोले?, शायद बात मुझे शुरू करनी चाहिए थी पर कुछ सूझा ही नहीं |

“कहाँ हो आप?” मैं कुछ बोलता उससे पहले ही वह बोलती चली गई | “आपको पता है आपका फ़ोन लग ही नहीं रहा था और मैंने आपको कई बार मेसेज़ किया आपके एक भी मेसेज़ का रिप्लाई नहीं आया ! आपसे बात ही नहीं  हो पा रही थी, मैं कैसे स्टेशन जाती?, इसलिए मुझे लगा की नहीं जाना चाहिए | पता नहीं वहाँ आपको कोई लेने आया भी या नहीं | आपको मेरी वज़ह से परेशानी भी हुई होगी, मैं बहुत गन्दी हूँ ऐसे कौन करता है | आप प्लीज़ नाराज़ मत होना पर आप मुझे डान्ट सकते हो? मैं बहुत गन्दी हूँ | आपका डिनर हुआ या नहीं? कब से भूखे हो? पता नहीं कुछ खाया भी या नहीं |” इससे पहले मैंने कभी एक साथ इतना बोलते नहीं सुना था उसे | वह थोड़ी सी परेशान लग रही थी और चिंतित भी |

“अरे....! बस हो गया | क्यों परेशान हो रही हो?”- मैंने थोड़ी आवाज़ ऊँची कर के कहा | मुझे ऐसा करना पड़ा | नहीं तो वह सुन ही नहीं पाती |
“अब क्या?”- उसने पूछा |
“अब कुछ नहीं !”- मैंने कहा |
“घर आ जाओ |”
“नहीं |”
“क्यों?”
“मैं यहाँ स्पोर्ट्स कॉलेज़ में हूँ दोस्तों के साथ | आज यहीं रहूँगा |”
“तो डिनर के लिए तो आ ही सकते हो?”
“हो गया |”
“कहाँ?”
“यहीं, स्पोर्ट्स कॉलेज़ के मैस में |

अब वह थोड़ी सामान्य थी | हमारी थोड़ी देर और बातचीत हुई | उसके फ़ोन आने से मुझे ख़ुशी हुई | अब भीतर की हलचल और चरम पे थी | भीतर ही भीतर मज़ा आ रहा था |
अब तक उनकी मीटिंग भी ख़त्म हो गई थी | इसलिए अनिल भैया के रूम में एक बार फिर सब इक्कट्ठे हो गए | देर रात हम लोगों की बातें चलती रहीं | स्कूल के दिनों को याद किया, सबने अपने अपने फ्यूचर प्लान बताए और स्कूल से निकलने के बाद के सारे अनुभवों को एक दूसरे से साझा किया | अंततः वे सब इस नतीज़े पर भी पहुँच  गए की हो न हो पर मैं किसी लड़की से मिलने यहाँ आया हूँ | पर मैंने नहीं स्वीकारा | मैंने कहा की सिर्फ़ मेला घूमने आया हूँ | वह अपनी बात पे अड़े रहे | मैं अपनी पर | काफ़ी रात हो गई थी उन सभी को सुबह जल्दी उठना होता है इसलिए वे सब सोने चले गए | और मैं अगली सुबह के इंतज़ार में पड़ा रहा हालाँकि थकान थी इसलिए नींद आ गई |   

अगले दिन काफ़ी देर से उठा | तैयार होते होते बारह बज चुका था | मैंने रात में अनिल भैया को कहा था की मेला देखने जाना है | वे बोले थे की बारह तक उनके सारे मैच ख़त्म हो जायेंगे फिर चल देंगे | मैं उनके इंतज़ार में था इस बीच शिवांशी का फ़ोन आ गया |

“तो क्या प्लानिंग है मैडम?”
“कुछ नहीं |”
“मतलब ये तो ग़लत है | पहले ख़ुद ने ही मेला घूमने का बोला | यहाँ बुला लिया | और अब बात से मुख़र रहीं है आप |”
“नहीं, तुम अपने दोस्तों के साथ जाओ | वैसे भी मेला घूमना ज़रूरी है | किसके साथ जाना है यह ज़रूरी नहीं है |”
“बिलकुल ज़रूरी है |”- मैंने कहा |
“नहीं है |”
“पर मेरे सारे दोस्तों की अभी क्लासेस चल रही हैं | सब व्यस्त है अपनी प्रैक्टिस में |”
“तो अकेले घूम आओ |”
“मुझे अब घूमना ही नहीं है |”
“क्यों?”
“अकेले घूमने थोड़ी यहाँ आया हूँ |”
“अच्छा मैं आ जाती हूँ आपको लेने |”
“नहीं, मैं आता हूँ बताओ कहाँ आना है?”
“अब ज़्यादा स्मार्ट बनने की ज़रूरत नहीं है | आ रही हूँ न |”
“ठीक है स्पोर्ट्स कॉलेज़ के गेट पे पहुँचता हूँ, आ जाओ”
“ओके, फ़िफ्टीन मिनट्स |”

मुझे लगा जैसे वह इंतज़ार में ही थी की हम साथ घूमने निकल जाएँ | पर ऐसा नहीं था | इसका अंदाज़ा मुझे तब हुआ जब मेरा पंद्रह मिनट का इंतज़ार एक घंटे में तब्दील हो गया | यह सब उसके लिए पहली बार था किसी के साथ इस तरह घूमना, समय बिताना | मेला घूमते समय उसने मुझे बातचीत में बताया और साथ ही यह भी बताया की उसे किस समय कैसे रियेक्ट करना है समझ ही नहीं आता | हम काफ़ी देर मेला घूमते रहे इस बीच बख़ूबी उसने इस बात का ध्यान रखा की मैं किसी भी वक़्त बोर न होऊं | वह रिश्तों और संवेदनाओं के मामले में इतने आगे है इसका अंदाज़ा नहीं था मुझे | हर एक क्षण यादगार बनता जा रहा था | इतने कम समय में ही उसकी दोस्ती न जाने कितनी गहरा गई थी मेरे भीतर | लगभग तीन घंटे बीत गए | उसने कहा की हम और घूम सकते है | पर मेले में कुछ और नहीं बचा था घूमने को |

मैंने कहा- “कहीं और चल दें |”
“मॉल”- उसका जवाब आया |
“नहीं | मॉल नहीं |”
“तो किला?”
“हाँ, ये ठीक है |”

“हमारा अगला प्लान बन गया था बिना देर किए हम किले के लिए निकल गए | मुझे वहाँ के किले के बारे में बिलकुल नहीं पता था जबकि वह बहुत प्रसिद्द है | हम ‘उरवाई गेट’ से भीतर गए थे | वहाँ दो गेट थे पहले का नाम ‘ग्वालियर गेट’ है | उसने किला घुमाते घुमाते मुझे उस किले से जुड़ी बातें, किस्से-कहानियां और घटनाएँ बताई | उसके साथ घूमना और ये सब जानना बड़ा ही रोचक था | वक़्त को थामने की तमन्ना जागी थी | पर जीना चाहता था उन पलों को, और जी रहा था | ‘मैं ख़ुद को बहुत धीमे-धीमे, थोड़ा-थोड़ा खर्च कर रहा था |’ उसने पास के काउंटर से टिकिट लिया अब हम एक दरवाज़े के सामने खड़े थे जो गहराई में जाता प्रतीत हो रहा था |

उसने आँखे बंद की, गहरी सांस ली और कहा- “चलो |”
“ये क्या है?”- मैंने पूछा |
“भूलभुलैया”- उसने जवाब दिया |

मेरे भीतर कुछ बुदबुदाहट उठ रही थी | यहाँ भूलभुलैया है- सचमुच | मैंने कल्पना ही नहीं की थी | यह सुनना  मेरे लिए बहुत सुख़द था | मैं हमेशा से ही किसी भूलभुलैया में जाना चाहता था और उसका साथ होना तो जैसे सपने में परी के मिलने की अनुभूति जैसा था | यह कैसी अनुभूति थी जो मैं जी रहा था | मैं यह जीना भी चाहता था | मैंने गहरी सांस भरी |
“यह तो क़माल हो गया | तुमने पहले नहीं बताया की यहाँ भूलभुलैया भी है |”
“क्या फ़र्क पड़ता है, अभी ज़्यादा मत सोचो और चल दो |”
“मैं पहली बार जा रहा हूँ |”

“तो क्या हुआ, अगर खो भी जाएँ”- कहकर वह मुस्कुरा दी |

“मैं तो खो ही चुका था”- यह मैं उसे कहना चाहता था पर नहीं कहा | हम भीतर गए | उस वक़्त वहाँ सिर्फ़ हम तीनों थे, मैं वह और भूलभुलैया | उस अकेलेपन में मेरे ऊपर एक अज़ीब सी दीवानगी छा रही थी | अब मैं सचमुच उसके प्रेम की गिरफ़्त में था | जैसे जैसे समय बढ़ रहा था मेरे भीतर सदियाँ बीत रही थीं | मैं वहां से निकलना नहीं चाह रहा था पर उसके भीतर का डर अब बढ़ रहा था वह पहले कभी इतनी देर भूलभुलैया में यूं नही घूमी थी | उसने मुझे बताया था की उसे अंधेरे से बहुत डर लगता है उसके बाद भी वह हिम्मत बांधे मेरे साथ घूमती रही | वह इस बात का ध्यान इस बीच कभी नहीं भूली की मैं बोर न हो जाऊं | मुझे मज़ा आता रहे और हर एक पल यादगार बनता रहे | उन पलों को मैंने जी भर जिया |

जब वह मुझे स्टेशन छोड़ने आई तो मुझे लग रहा था की मेरी दुनिया ही मुझसे छूट रही है | मेरा मन ही नहीं हो रहा था की उसे बाय बोलूँ | अभी ही तो यात्रा शुरू हुई थी हमारे साथ की | मेरी ट्रेन चलने वाली थी मैंने उसे कहा-
“तू कविता है, तू भूल भुलैया है |”  
और ट्रेन चल दी | हम दूर जाते जा रहे थे | पर असल में हम और पास आते जा रहे थे | पूरी यात्रा कब बीत गई  पता ही नहीं चला | मैं उसके ख़यालों से बाहर ही नहीं निकल पाया | पूरी यात्रा के दौरान उसके मेसेज़ आते रहे | जब घर पहुंचा तो एक ख़याल आया की कविता पूरी कर लूं | और मैंने एक अन्तरा और जोड़ दिया | उसके आगे और कुछ लिखा नहीं जा सका-

"मैं चाहता हूँ, एक भूलभुलैया हो 
कितना अच्छा हो
मैं और तुम जीवन भर उसमें 
भटकें, भूलें और खो जाएँ 

भूलभुलैया की चुप्पी में 
कहीं क़ैद हो जाएँ- आवाजें 
कितना अच्छा हो 
मौन हमारा प्रेम हो जाए 

एक पथ पर तुम चलती हो 
एक राह मेरी भी है 
कितना अच्छा हो अगर 
ये दो राहें मिल जाएं 
मैं और तुम जीवन भर उनमें 
भटकें, भूलें और खो जाएँ" 



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