Tuesday, 12 December 2017

कल्पना

उस रात जैसे मेरी आँखों को नींद ही नहीं आई | बस एक हलकी झपकी ही ली थी और कुछ ही देर मैं अब भोरे होने वाली थी | बिस्तर से उठकर खिड़की के करीब जा खड़ा हुआ | जब अपना माथा खिड़की के ठन्डे सरिये पर रखा तब कहीं पिछले दिन की उदासी टूटी पहली बार बहुत अजीब सा घट रहा था जो अब तक मैंने महसूस नहीं किया था | किसी फ़िल्म के दृश्य जैसे नायक के स्मृति पटल पर उभरते हैं  जो उसे उत्पीड़ना देते है, परेशान करते है ठीक उसी तरह मैं ख़ुद को उस बेचारे पंछी की तरह महसूस कर रहा था जो क़ैद से निकल भागना तो चाहता है पर पंख भी नहीं हिला पा रहा है | अब तक जिंदगी को इतना बेबस और लाचार नहीं पाया था | कुछ अजीब ही छटपटाहट शेष थी जिससे गुज़रकर एक सुकून भरी सांस ली | मेरी आँखों के सामने कितना कुछ था | उस वक़्त लगा की किसी वियावान जगह में खड़ा हूँ अकेला, सिर्फ़ मैं | पेड़ की पत्ती जो ज़मीन छूने वाली थी जैसे रूककर मुझसे बोली, “घबराओ नहीं, यह तो ज़िन्दगी की शुरुआत है ऐसे अनेंकों अनुभवों से गुज़रकर ही तो ज़िन्दगी बनती है |”

तुमने कभी प्यार किया है?, मैंने अनायास ही उससे पूछा |

वो खिलखिलाकर हँस पड़ी... “हाँ”, ‘लेकिन हमारा प्यार कभी तुमसा नहीं रहा |’ मेरी प्रितिक्रिया के लिए जैसे वो रुकी हो...! मुझे उलझता देख वो बोल पड़ती उससे पहले ही हवा के एक झोंके के कारण और देर न ठहर सकी मेरे संकुचित मन को और उलझन में डाल ख़ुद मिट्टी हो गई | मानो हवा का कोई झोंका दूर कहीं से आया हो सन्देश लेकर |
मैंने जैकेट उठाया और सीढ़ियाँ जो शांत थी वातावरण की चुप्पी को तोड़कर मेरे क़दमों को जकड़ने का प्रयास करने लगीं | किसी अपरिचित से लगने वाले व्यक्ति को सामना देखकर मैं ठिठका

“अरे, क्या हुआ देवेन्द्र?”

वह अपरिचित से लगने वाले वृद्ध जिन्हें में काका कहकर बुलाता था हमारी कॉलोनी के चौकीदार थे | अक्सर ठण्ड में, वह कॉलोनी के गेट के क़रीब आग जलाया करते थे | जब से मैं इस कॉलोनी में रहने लगा था अक्सर मेरी रातें उनके साथ तापते हुए और बातचीत में गुजरती थीं | काका उसी बिल्डिंग में रहते थे जिसमें सैकड़ो फ्लैट थे वह एकदम मुर्दा लगती थी जो हमेशा ख़ुद में एक वियावान सी आहट संजोय रखती थी |

 “कुछ नहीं काका, मैं ठीक हूँ |”

काका के चेहरे पर असंतोष के भाव थे | जिन्हें अन्देखा कर मैं तेजी में निकल आया | उस वक़्त कोई भी मुझे देखकर ही जान सकता था की मैं किसी उलझन में हूँ | काफ़ी समय बीत गया मैं नितांत अकेला शहर से दूर चला जा रहा था पता नहीं कहाँ?, एक पल को उस अकेले पार्क में जो अब वीरान हो चुका था जहाँ अब कोई नहीं जाता, सिवाय पंछियों के ! मैं किसी काया की आहट महसूस करता हूँ | नज़रें उठाने पर सिवाय वीरानी के कुछ हासिल नहीं होता | वहीँ पड़ी एक बेंच तक जाता हूँ | हर फासलें पर सूखी टहनियाँ पड़ी थीं जो अब अपना तना छोड़ चुकीं थीं | पत्तियाँ ठीक चांदनी की तरह ही बिखरी पड़ी थीं | पार्क के झूले और फिसल पट्टियाँ जो अब वहाँ का साजो सामन था ठीक चौराहे पर खड़ी मृत मूर्तियों की तरह पार्क की वीरानी को सुसज्जित कर रहे थे और तरह तरह की बेलें जो चारों तरफ़ बिखरी हुईं थी ठीक मकड़ी के जालों सा प्रतीत हो रही थीं | छोटे छोटे कीटों ने वहाँ अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया था और वे सब अपने कार्य व्यापार में व्यस्त दिख रहे थे | पक्षियों की चहचहाहट जलते बुझते दिए सी भ्रमित कर रही थी | बेंच पर पड़े पड़े मैं कब सो गया पता नहीं !. जब उठा तो चौंकना जायज़ था |

 “तुम कौन हो?”- मैंने पूछा |                                                                          
 “अभी हम मिले थे |”                                                                                      
 “क्या.....!, कहाँ?”                                                                                          
 “सपने में |”

मुझे उसकी बातों पर हँसी भी आ रही थी पर भीतर से मैं भयभीत था | मुझे लगा मैं नशे में हूँ और साथ ही पगला गया हूँ | यह जो लड़की मेरे सामने बैठी है हो न हो यह मेरा भ्रम है ! होश में आने के लिए मैंने अपना माथा हाथ से ठोका | वो अब भी यहीं थी | आगे क्या कहना है क्या करना है मुझे समझ नहीं आ रहा था |

 “चलो- उसने कहा |”                                                                                      
 “कहाँ?”                                                                                                
 “यह मुझे नहीं पता, तुमने सिर्फ़ चलने की बात कही थी |”                                                           
 “कब?”                                                                                          
 “सपने में |”                                                                                
 “हाँ, तो ठीक है, चलते हैं |”

अब हम साथ चलने लगे | पता नहीं कहाँ?, पर हम दोनों ही चलना चाहते थे- बिना सोचे, बिना समझे बस साथ-साथ | हम चले जा रहे थे | वो मेरे बाएं तरफ़ थी और में उसके दाएँ | थोड़ी थोड़ी देर में हमारे हाथ टकराते और मेरे भीतर सिहरन सी दौड़ जाती | मैं किसी के साथ होना चाहता था | साथ चलना चाहता था और अब हम साथ चल रहें थे |
“जब तुम आईं थी, तब मैं क्या कर रहा था |”- मैंने बातचीत शुरू करने के लिहाज़ से कहा |
“तुम सो रहे थे”, ‘वह बोलती रही |’, तुम बाईं करवट सो रहे थे,  तुम्हारे बगल में आधा बिस्तर ख़ाली था मुझे लगा तुमने वह जगह मेरे लिए बनाई है | इसलिए, बिना तुमसे बातचीत किए मैं तुम्हारे बगल में सो गई | मैं बाहर ठण्ड से आई थी तुम्हारे बिस्तर में गर्माहट थी | बिस्तर में लेटते ही एक सुखद अहसास हुआ | उस क्षण के लिए मुझे तुमसे प्यार हो गया |                                                             
मैं मुस्कुरा दिया | मैं सोचने लगा यथार्थ से परे सपने और कल्प्नाओं की दुनिया कितनी सुखद होती है | मैं प्यार और साथ की बात करने लगता हूँ कितना अजीब है ये अहसास | इस बीच कहीं हमारी  बातचीत न टूट जाए मुझे इसका डर था |

 “फिर?”- मैंने पूछा |

वह शरमाई सी आँखों से मुझे देखने लगी | उसके क़दमों की गति में ठहराव आने लगा था |

 “मुझे थोड़ी देर बैठना है |”- उसने कहा |                                                             
 “पर क्या बैठा जा सकता है?                                                                   
 “क्यों नहीं?”                                                                                         
 “क्योंकि हम दोनों ही नहीं बैठना चाहते थे जब हमने चलना शुरू किया था |”

अब उसने मेरा बांया हाथ अपने दाएँ हाथ से पकड़ा | हम दोनों एक दूसरे की तरफ़ खिंचे चले आए | अब वो मुझसे चिपककर चलने लगी थी, धीरे-धीरे | और उसने अपना माथा मेरे कंधे से टिका दिया था | सब कुछ स्लो मोशन में चल रहा था अब | हम धीमे-धीमे पता नही कहाँ?, पर चले जा रहे थे |

 “फिर क्या हुआ?”                                                                                     
 “फिर..!”, थोड़ी देर चुप्पी |                                                                                           
 “फिर तुमने करवट बदली |”

तुम्हारा हाथ मेरे वक्ष पर था और कलाई मेरे गर्दन और चेहरे पर | तुम्हें होश नहीं था पर मेरे होने का अहसास था | तुम्हारी कलाई स्थिर थी सिवाय अंगूठे के | तुम अंगूठे से मेरा गाल सहला रहे थे | धीमे-धीमे | प्यार से |

"फिर, - मुझे उसकी बातें अलग ही सुकून दे रही थीं | मैं चाहता था वो बस बोलती रहे | उसने चलना बंद कर दिया सहसा मुझे भी रुकना पड़ा | इस एवज में की वो क्यों रुकी मैं उसकी तरफ पलटा | वो तपाक से मेरे नज़दीक गई | इतने करीब की मैं मैं उसकी साँसों की गर्माहट महसूस कर सकता था |
"फिर तुमने मुझे अपनी और खींचा, - कहते हुए वो और नज़दीक गई |
"हम एक दूसरे की साँसों से जीने लगे थे | मुझे लग रहा था की ठण्ड के मौसम में गर्माहट से भरा पेड़ मुझे छाया दे रहा है | वो जितनी मेरे नज़दीक आती जा रही थी उसकी आवाज़ उतनी मद्धिम मगर जादूभरी होती जा रही थी | हमारे होंठों के बीच क्षण भर जो फ़ासला बचा था अब वो मुझे ही तय करना था | सो उसके बताये हिसाब से मैंने दोबारा ठीक वैसे ही अपना हाथ उसके गाल पर रख दिया और अंगूठे से उसका होंठ सहलाने लगा |
"फिरमैंने कहा |
"पता नहीं, उसके बाद पूरी रात मैंने तुम्हारी साँसों को महसूस किया है |

हम सुनसान सड़क पर अकेले थे | दूर दूर तक हवाओं की सांय सांय के शिव कोई और शोर नहीं थे | आस पास के घने ऊँचे पेड़ों पर बैठे पंछी हमें ताड़ रहे थे | दूर दूर तक गहरी वीरानी थी | इतनी वीरानी में मेरे भीतर गहरा रोमांस उमड़ रहा था | मैं एकदम उस दृश्य के करीब था जिसे में हमेशा महसूस करना चाहता था | मैं अगर थोड़ी देर और करता तो चूक जाता इसलिए मैंने अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए |

एक क्षण बाद वो तेज़ी में मुझसे दूर हठी | एक पल के लिए मुस्कुराई और भाग पड़ी | मैं उसके पीछे पड़ा | उसकी मुस्कान हसीं में तब्दील हो गई | वातावरण में उसकी हसीं की आवाज़ गूँज रही थी | भागते भागते वो नदी किनारे पहुँच गई | मैं वहाँ नदी देखकर असमंजस में था |

"यहाँ नदी भी है?"
"हाँ, तुम्हे नहीं पता? आओ - उसने मेरा हाथ पकड़ा और खींचकर किनारे ले गई | मैं खड़ा खड़ा सब देख रहा था | वो बैठ गई ठीक किनारे और उसने अपने दोनों पैर नदी में डाल दिए |
"बैठो बैठो |" - मैं उसके पास बैठ गया |

"मैं बहना चाहती हूँ नदी की तरह

"आसपास कोई नहीं होता | उस अकेलेपन में थोड़ी सी किसी के न होने की कमी खलती है |  फिर एक आता है, दूसरा आता है, तीसरा आता है.. आपके आसपास बहुत सारे लोग हो जाते हैं | तलब, जैसे किसी नशेड़ी को दारू और जुआरी को दाव लगाने की होती है ठीक वैसे ही मुझे फिर से अकेला हो जाने की होती है | अपने अलावा किसी और की संगति भाती ही नहीं है | पहली बार तुम्हारे आसपास होने पर लगा नहीं की कोई और है |"

"पर मुझमें ऐसा क्या है ?"
"सादगी |"
"वो तो सब में होती है" - उसने अपनी पलकें नम कीं |
"सब में नहीं होती है !"

वो चलकर मेरे पास आई, मेरे बगल में बैठकर उसने अपने हाथ मेरे कन्धों पर रख लिए |

"होती है, पर तुम्हें सबके अंदर दिखाई नहीं देती |"
"हो सकता है", पर क्या वाकई ऐसा संभव है की दुनिया में बेबकूफ न हों |"

वो खिलखिलाकर है दी | और खूब देर तक हस्ती रही |

"पर ऐसा भी तो हो सकता है की कोई और भी तुम्हारे बारे में ऐसा सोचता होगा |"
"मैं यह जनता हूँ |"
"फिर ऐसे सवाल क्यों करते हो?"
"मैं सवाल नहीं कर रहा था |"
"तो?" - इस बात ने उसके ज़ेहन में सवाल खड़ा कर दिया था |
"मैं तो इज़हार कर रहा था |"
"क्या?"
"दिक्कत तो यही है की कोई समझ नहीं पाता, और मैं सालों से उसे ढूंढ रहा हूँ जो समझ सके |"

उसने दोनों हाथों से मेरे गाल अगल बगल से पकड़ लिए | और मेरी आँखों में झाँकने लगी | उसका मेरी आँखों में झांकना इतना सुन्दर अहसास था की उसकी छुअन से मैं उड़ रहा था | पहली बार मैंने खुद को किसी के छूने से उड़ते हुए महसूस किया |

"मैंने सपने में कभी कोई चेहरा नहीं देखा बस किसी का होना महसूस किया है |"

एक क्षण और मेरी आँखों में झाँकने के बाद वो मेरे कसकर गले लग गई | बाहों में होना मुझे सबसे सुखद लगता है | 'मुझे लगता है की दुनिया सिर्फ उतनी है जितनी आपके लिए कोई बाहें लिए बाहें फैलाता है |'
    
"मैं तुम्हें चूमना चाहती हूँ!”

उसका निचले होंठ में दुनिया की सबसे महीन लालिमा थी | उसकी पलकें आहिस्ता झुकी, हवा की सांय सांय भी अब मेरे कानों को नहीं छू रही थी | मैं अक्सर सोचता हूँ की कुछ क्षण कितने महीने होते हैं, एकदम अलहदा | प्रकृति की रिदम से अलग कोई नई तरंग जब आपके बीच आती है उसकी सुंदरता बेहिसाब होती है | मैं किसी भी कीमत पे इस क्षण को जाने नहीं दे सकता था | वातावरण की ठंडक मद्दिम पढ़ गई थी | फैली थी बस उसके साँसों की गर्माहट, चारोतरफ |

"तुम्हारी साँसे काँप रहीं हैं |" - मैंने मध्दिम सुर में उससे कहा |
"साँसे जब सच होती है तो वो कांपने लगती है |"
"सच |"
"मैं तुम्हारी साँसों को सुन रही हूँ और वो मुझे खुद से कहीं ज़्यादा सच्ची लग रही हैं |" - उसने कहा |

मेरा हाथ उसके दाएं वक्ष के इंच भर नीचे रखा था, उँगलियाँ उसकी पीठ पर थीं | उसने अपने दोनों मेरे कंधे के ऊपर रखे थे और आहिस्ता आहिस्ता अपना अंगूठा मेरी गर्दन पे रगड़ रही थी |

"तुम्हारी कल्पना की दुनिया कौन है?" - उसने मुझसे पुछा |
"तुम |" - मैं कहा |

उसकी आँखों में नमी थी | उसने मुझे चूमा | हम खूब देर एक दूसरे को चूमते रहेवो उठकर नदी की और भागी | किनारे के वो जगह उसे पता थी जहाँ वो पैर लटकाकर बैठ सके और पानी उसके पैरों को छूता हुआ जाए | मैं उस छुअन के बाद जगह से उठ सका | किसी भी अहसास से तुरंत बाहर आना मेरे बूते का नहीं है | उसने मेरी ओर मुड़कर देखा | वो मुस्कुरा रही थी | मैं उठकर उसके पास गया |

"तुमने पास वाला पहाड़ देखा है?" -उसने पूछा |
"हाँ |" - मैं अब तक बैठा नहीं था |
"मुझे लेकर चलोगे?"
"क्यों नहीं |"
"तुम्हे पहाड़ पसंद हैं?"
"बहुत |" - वो मेरी आँखों में देखने लगी |
"तुमने कभी अपनी आँखें देखीं हैं?"
"क्यों?"
"तुम्हारी आँखों में पहाड़ के होने का अहसास होता है |" - आहिस्ता उसकी पलकें हिल रही थीं |
"और नदी?" - मैंने पूछा |
"नदी तो तुम्हारे साथ होने के अहसास में है |"
"तुम्हें क्या दिखता है मेरी आँखों में? - वह बोली |
"समंदर |"
"बस?"
"आसमान भी दिखता है |" - मैंने उसकी उत्सुकता टूटने नहीं दी |
"झूठे, मेरी आँखें इतना सब कुछ कैसे समेट पाएंगी? कुछ छोटा नहीं दिखता?"
"दिखता है ?"
"वही तो मैं कब से पूछ रही हूँ |"

उसके इस तनिक भर चिड़चिड़ेपन पर मैं मुस्कुरा दिया | मासूम गुड़िया लगती है जब उसकी नाक पे थोड़ा सा चिड़चिड़ापन आता है | मुझे नहीं पता था वो क्या सुन्ना चाहती है |

"अरे बताओ ? क्या दीखता है?"
"चिड़िया |" - मैंने कहा |
"मुझे पहाड़ चढ़ना है |"
"चलो |"

और हम पहाड़ की तरफ चलने लगे | एक आम के पेड़ के नीचे से गुजरते हुए उसने कच्ची कैरी उठा ली |

"थोड़ा सा नमक और मिर्च होती तो कितना अच्छा होता |"
"हाँ |"
"मेरे मुँह में पानी गया, तुम खाओगे?"

मैंने हाँ में सर हिलाया | वो पेड़ के तने के पास गई और कैरी को डंठल की ओर से रगड़ने लगी | फिर उसने अपने दांतों के बीच कैरी को रखकर खूब ज़ोर से कतरा | एक भाग उसने मुझे दिया और गोई से तने पर उसने दिल बनाया |

"इस्पे हमारा नाम लिख दूँ?"
"हाँ |"

उसे तो मेरा नाम पता ही नहीं था | उसकी उत्सुकता के कारण में कुछ बोला नहीं | मैं बस उसका मेरी ओर मुड़ने का इंतज़ार कर रहा था ताकि मैं उसे अपना नाम बता सकूं | उसने 'देव' लिखा और उसके बगल में कल्पना |

"मैंने तो तुम्हें अपना नाम बताया ही नहीं |"
"तुम्हें तो हमारी बहुत सारी बातें पता ही नहीं हैं |"
"हाँ, क्योंकि हमने बातें की ही नहीं हैं |"
"की हैं |"
"कब?"
"सपने में |"
"मैंने कहा , मुझे सपने याद नहीं रहते | बस, सपने में जो गुजरा है उसका अहसास साथ रहता है |"
"कोई बात नहीं |" - वह बोली |
"थोड़ा भाग लें | पहाड़ बहुत दूर है |"
"हम भागेंगे?" -कितना बचपना था उसमें |
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि चलना बेहतर है |"

उसने फिर से मेरे अगल बगल अपनी बाहें डाल दीं | मुझे उसकी ये आदत सबसे अच्छी लगती है | किसी के लिए बाहें फैलाना दुनिया की सबसे अलहदा बात है | मुझे हर उस व्यक्ति से प्यार है जिसकी बाहों में मेरे लिए जगह है |

"प्लीज, चलो थोड़ा भागते हैं, फिर पहाड़ पर चढ़कर ज़ोर से चिल्लायेंगे |"

मुझे भागने से ऐतराज़ नहीं था पर मैं उसके साथ बिलकुल भी वक़्त, वक़्त की गति से ज़्यादा नहीं बिताना चाहता था | मैं उसी गति से चलना चाहता था जिस गति से समय चलता है | क्योंकि वो सच है या झूठ | असल है या नहीं मुझे इसका कोई तकाज़ा नहीं था | उसने मेरा हाथ पकड़ा और भागने लगी | हम काफी देर भागते रहे और पहाड़ के करीब पहुँच गए | हमारी साँसे फूल गई थीं |

"भागने में मज़ा आता है ?" -  उसने अपने दोनों घुटनों पे हाथ रखे, वो खड़े खड़े ही सुस्ता रही थी |
"बहुत |"
"फिर भागने में इतना आनाकानी क्यों कर रहे थे?"
"मेरी आदत है |"
"आदत तो नहीं हैं |"
"तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?"
"तुम्हें चूमते वक़्त तो तुमने कोई आनाकानी नहीं की |"
"मैंने हाँ भी तो नहीं कहा था |"
"कुछ कहना तो हाँ ही होता है |"
"कुछ कहना भी तो हो सकता है |" - उसके चेहरे पर उदासी गई |
"पर उस वक़्त 'हाँ' ही थी |" - मैंने सिचुएशन को सँभालने की कोशिश की |

वो मुँह बिगाड़े अकेली ही पहाड़ की तरफ भागी | उसने एक बार भी मुड़कर मेरी तरफ नहीं देखा | एक पल में सोचता रहा | फिर बहुत तेज़ भागा | मैंने उसे भागते हुए पीछे से पकड़ लिया | वो रुक गई | दरअसल वो थम गई थी |

"मैंने तुम्हारे बारे में एक बात महसूस की है?"
  
उसने मेरी बात का कोई जबाब नहीं दिया | वो बस चुप थी | मैंने उसे अपनी तरफ घुमाया | वो नज़रें चुरा रही थी | मैंने उसकी आँखों में झाँका, पर उसने नज़रें नहीं मिलाई |

"तुम तो मेरी इक्छा हो, अनिक्षा कैसे हो सकती हो?"

उसकी आँख से एक कतरा आँसू ज़मीन पे गिरा | मैं इसके लिए कतई तैयार नहीं था | मुझे तो किसी के आंसू पोंछने भी नहीं आते | मैंने उसकी आँख के नीचे अंगूठा रगड़ा, बहुत आहिस्ता | और कसकर उसे बाहों में भर लिया |

"मेरी बात अगर बुरी लग गई हो तो माफ़ कर दो, मेरा अंदेशा उस वक़्त से नहीं था | वो बात मेरे जीवन के विषय में थी |"
"नहीं, बात वो नहीं है |"
"फिर क्या बात है |"
"पता नहीं, कुछ है जो खामोश रखना चाहता है |"

कोई कभी बजह खामोश रहने की ज़िद करता है तो मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता | कोई किसी का मन कैसे पढ़ सकता है | मैं कैसे किसी की उदासी जान सकता हूँ | खामोश उदासी एक पहेली के जैसी होती है | और पहेलियों के हल निकाल पाना मेरे बूते का नहीं है क्योंकि जब तक पहेली वाज़िब हो उसमें एनर्जी खपाना मुझे जायज़ नहीं लगता | वो कसकर मेरे गले लगी रही | ऐसा लग रहा था जैसे सूरज हमें निहार रहा हो | गले मिलना कितना होता है | मेरा बस
चले तो मैं एक पल के लिए भी उसकी बाहों से बाहर आऊं |

"ख़ामोशी अच्छी होती है या बुरी?"
"अच्छी |" - वो तपाक से बोल पड़ी |    

ख़ामोशी से मेरा गहरा लगाव है | पर मैंने कई बार महसूस किया है की ख़ामोशी कभी कभी सब कुछ ले डूबती है | लेकिन कई बार ख़ामोशी कुछ बचाकर भी रखती है | अब हमारे बीच अगले पल की ख़ामोशी कुछ ले डूबने वाली थी या बचाने वाली थी इसका कोई अंदाज़ा मुझे नहीं है |

"ख़ामोशी से तुम्हारा रिश्ता कैसे बना |"
"कुछ रिश्ते विरासत में मिलते हैं, ख़ामोशी मुझे विरासत में ही मिली है |" - उसने कहा
"क्या हमें एक दूसरे को जानना चाहिए?"
"क्या घर-परिवार, प्रोफेशन, शौक और आदतों की बातें कर लेने से हम एक दूसरे को जान लेंगे |"
"नहीं |"
"तब तो मुझे कोई दिलचस्पी नहीं हैं |"

मुझे भी नहीं थी | और मुझे कभी नहीं होती | मैं तो चाहता हूँ कोई मुझसे दुनियादारी की बातें करे ही | कहीं तीसरे धरातल की बातें हो | हम अजनवी होते हुए एक दूसरे के ज़्यादा करीब होते हैं | मुझे लगता है, एक दूसरे को जानना हमें दूर करता है | किसी को हम जितना जानते जाते हैं उतना उससे दूर होते जाते हैं |

"हमें परिचय की आव्यशकता क्यों होती है?" - उसने सवाल किया |
"शायद मैं इसका जबाब नहीं दे सकता | क्योंकि मैंने कभी अपना परिचय किसी को दिया ही नहीं |" - मैंने कहा |
"वापस चलें |"
"लेकिन पहाड़ तो चढ़ लें पहले |" - मुझे उसकी इच्छा याद थी |

हम दोनों एक दूसरे से अब तक चिपके थे | मेरी टीशर्ट पर पसीने की कुछ बूंदे उकर आई थीं | उसकी त्वचा से हलकी गर्माहट रही थी | ठंढ के मौसम में हमारे भीतर इतनी आग बची थी |

"चलें?" - मैंने फिर से कहा |
"चलो |"

हम पहाड़ चढ़ने लगे | इस दौरान हमने कोई बात नहीं की | यह ख़ामोशी सुनने का वक़्त है | बीच बीच में वो मेरी और देखती और मुस्कुराती एवज़ में, मैं भी यही कर रहा था | ख़ामोशी से बड़ी कोई आवाज़ नहीं होतीकुछ देर में हम पहाड़ की चोटी पर पहुँच गए थे | पहाड़ पर पहुँचते ही वो ज़ोर ज़ोर से मेरा नाम पुकारने लगी | यह मेरे लिए बहुत अजीब था | किसी ने मेरा नाम कभी नहीं पुकारा इस तरह |

"तुम भी चिल्लाओ?"
"क्या |"
"बुद्धू, कुछ भी | इसमें इतना सोचना क्या! दिल से जो आवाज़ रही हो |"
"मेरे दिल की कोई आवाज़ मुझे सुनाई ही नहीं देती |"
"फिर क्या सुनाई देता है |"
"मैं बहरा हूँ |" - इस बात पे मुस्कुराते हुए उसने आँखें तरेर दीं |
"तुम बहरे हो ? गूंगे तो नहीं हो? चिल्लाओ |"
"मेरी ऐसी कोई अंदरूनी इच्छा नहीं है, मुझे पहाड़ की चोटी पे ख़ामोशी अच्छी लगती है |"
"ज़्यादा ख़ामोशी ज़िंदगी में हो तो वो ज़हर बन जाती है, थोड़ा सा शोर अपने साथ रखना चाहिए |" - मुझे लगा वो मुझसे मेरी ही ज़बान बोल रही है |
"तुम्हारी आवाज़ काफी है, मैं इसे सुन्ना चाहता हूँ बस | सिवाय उसके कुछ भी नहीं |"

वो दो कदम मुझसे दूर उस और गई जहाँ गहरा सन्नाटा था | और ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगी | अच्छा हुआ वो बहुत ज़िद्दी नहीं है | कभी कभी ख़ामोशी इस कदर ऊपर चढ़ जाती है की मैं कुछ भी बोल ही नहीं पाता फिर चिल्लाना तो बहुत दूर की बात है |


"इधर आओ |" अरे, आओ ! -उसने दो बारी बढ़ी उत्सुकता से बोला |
"वहाँ देखो |" - वह मुझे कुछ दिखाना चाह रही थी |

मैं उसके पास गया | पहाड़ के दूसरी तरफ झील थी | झील पर धुएं की एक हलकी चादर बिछी थी | झील झील नहीं, आसमान लग रही थी | लग रहा था समंदर पर बादल तैर रहे हों |

"हम वहां चलें?" - थोड़ी ढलान क्रॉस करने के बाद, एक किनोर से हम और करीब से देख सकते थे | पर वहाँ जाना रिस्की था |
 "सुनो, ढलान तीखी है | हम फिसल गए तो डूब जायेंगे |"
"तो क्या हुआ, डूबेंगे तो दोनों डूबेंगे |" -कहते हुए वो मुस्कुरा रही थी

प्रेम में कोई कितना आपके साथ चल सकता है इसे किसी कहे में नहीं आँका जा सकता | पर कहे गए साथ की बात दिल को बहुत अच्छी लगती है | उसका मेरे साथ होना सचमुच कल्पना ही था क्योंकि यथार्थ में अब तक किसी के भी सन्दर्भ में कहूँ तो मैंने किसी का ऐसा साथ महसूस किया है और ही किसी का कहा गया दिल को भाया है | ये वो बात है जो जागते, सोते, जीते हर मायने में मुझे कहीं भी खींच के ले जा सकती है | साथ की बात जादू होती है |

मैं बिना कहे उसकी बात की तरफ खींचा चला गया | मैं उस ढलान की और चलने लगा |

"अरे बुद्धू, मेरा हाथ तो थामो |" - उसने मेरी आँखों में झांकते हुए कहा | मैंने उसका हाथ थमा |
"तुम्हें भी सहारे की ज़रूरत होती है |"
"अब तक तो नहीं थी, पर तुम्हारे मिलने से होने लगी है | सहारा दोगे?"
"हाँ |"

कितनी सच्ची बात थी | हमें किसी के सहारे की कभी ज़रूरत नहीं पड़ती | सच में | प्रेम ही है जब हम किसी की कमी महसूस करने लगते हैं | सहारा वो मांग रही थी या दे रही थी! ये असमंजस की बात नहीं है क्योंकि दरअसल हम दोनों को एक दूसरे के सहारे की ज़रूरत थी |

हम झील के किनारे पहुंचे वाकई कितना सुन्दर दृश्य था | कभी कभी ज़िंदगी सपना हो जाती है और सपना ज़िंदगी जीने लगता है | वो डरती जा रही थी और बढ़ती जा रही थी | हम एकदम किनोर तक गए | वहां से खूब देर हमने झील में झाँका, बादलों से बातें की |

"वहां चलो |" - उसने कहा |

वहां एक पेड़ था | एक सुर्ख पतली पगडंडी थी | हम उस पहाड़ की पगड़न्ड़ी पे चलने लगे | वो इकलौता पेड़ था उन झाड़ियों के बीच, ज़मीन पर लालिमा बिछी थी और अब भी पेड़ में उतने ही फूल बाकि थे जितने ज़मीन पे पड़े थे | उसने भागकर पेड़ की सबसे निचली टहनी पकड़ी और उसे ज़ोर ज़ोर से हिलने लगी |

"अरे जल्दी आओ |" -उसने मुझे कहा |

मैं उसके पास गया | उसने एक हाथ से मुझे उस डाली के नीचे खींच लिया और टहनी हिल|ने लगी | कुछ फूल हमारे ऊपर गिरे, दोनों के | उसने अपने हाथ फैलाये और आँखें बंद करके अपने ऊपर फूलों की बर्षा महसूस करने लगी | उसने आँखें खोली वो मेरी तरफ मुढ़ चुकी थी | मैंने बिना कुछ सोचे समझे अपनी तरफ खींच लिया और बिना देर किये उसके होंठों को बेतरतीबी से चूमने लगा | वो साथ देने में कमाल थी चाहे मामला कोई भी हो |

"मुझे नींद रही है |" -कितना अजीब था उसका ये कहा |

अभी एक पल पहले ही हिरणी जैसी उछल कूद कर रही थी और अब सोना चाहती है | खुले आसमान के नीचे, ज़मीन पर, भय नहीं है उसे कोई | उसकी ये कल्पना कितनी अलग है! मैंने अपने आस पास नज़रें दौड़ाईं | वहाँ एक चबूतरा था | मैं उसे चबूतरे की तरफ ले जाने लगा | अब वो एकदम से आलस से भर गई थी | उसकी पैर भले ज़मीन पर थे पर असल में मैंने उसे गोद में उठाया हुआ था | लोरते लोरते वो मेरे साथ उस चबूतरे तक गई | उसने मेरी शर्ट के बटन खोले और अपना चेहरा मेरे सीने पर रख कर छुपा लिया | मुझे कस कर पकड़ रखा था उसने |

"घर चलें?" - मैंने उससे पूछा |
"कल्पना कभी घर नहीं जाती |" - उसने शर्ट के बाहर झाँककर कहा |
"और कल्पना को नींद आती है ?" - मैंने पूछा |
"बहुत, कल्पना थक गई है, कल्पना सोना चाहती है |" - लग रहा था जैसे उसे अचानक किसी चीज़ का नशा हो गया हो |
"यहां?" - मैंने सवाल किया |
"हाँ, कल्पना के लिए तो आसमान ही छत है |"
"एक बात कहूँ?" - दो पल रूककर वो बोली |
"हाँ |" - मैंने कहा |
"कल्पना को सोने मत देना |" - बस इतना कहने के बाद वो कुछ नहीं बोली | और कसकर गले लगी रही |
"अब तो मुझे भी नींद रही है |" - कुछ पलों के मौन के बाद में बोला |
"चलो, दोनों एक दूसरे की बाहों को ओढ़कर सो जाते हैं |" - उसने फुसफुसाकर कहा |

मैंने उसे गोद में उठाया और उस चबूतरे पर लिटा दिया | उसकी आँखें बंद थीं | वो सचमुच गहरी नींद में लग रही थी | जैसे ही मैं उसकी बाहों से एक पल अलग हुआ उसने अपनी आँखें हलकी खोलीं और बाहें मेरी तरफ फैला दीं | मैं उसके बाहों में गस्त में प्रवेश कर गया | हम दोनों एक दुसरे को कसकर बाहों में भरकर लेटे रहे |

"अच्छा अब कब मिलोगे?"
"क्या मतलब?"
"मतलब, आज जब हम वापस लौटेंगे उसके बाद?"
"हम साथ में वापस लौटेंगे, मेरे कमरे पे | फिर मेरा कमरा हमारा घर हो जायेगा |"
"तुम्हें पता है?" - और वो रुक गई |
"क्या?"
"जब तुम चूमते हो तो लगता है किसी ने आत्मा चूम ली हो |" - नींद हमें चरों तरफ से घेर चुकी थी पर अभी हमने हथियार नहीं थे |
"और तुम्हे पता है जब तुम मेरे इर्द - गिर्द अपनी बाहें फैलाती हो तो लगता है जैसे मैं ज़िंदगी में गया हूँ फिर से | मैं जीने लगता हूँ |"
"मुझे तुम्हारी साँसों की गर्मी महसूस करनी है, और पास आओ |" - कुछ देर के मौन के बाद आहिस्ता उसकी आवाज़ आई |
"इतना |" - हमारे होंठ एक दुसरे के होंठों को छूने लगे थे |
"हाँ |"
"मुझे अपनी बाहों की कैद से निकलने मत देना, और कसकर पकड़ो |" - मैंने उसे और जकड़ लिया |
"कभी नहीं |" -मैंने कहा |
"मेरी आँखों में क्या दिखा रहा है?" -उसने पूछा? उसने यह कहते हुए नींद के आगे अपने हथियार डाल ही दिए थे |
"आसमान |" मैंने कहा |
"तुम्हारी आँखों में धरती है |" - वो बोली | और वो सो गई |

मैंने उसे चूमा | मैं भी नींद के सामने निहत्था होना चाहता था और उसके सही मायने में उसकी बाहों में होते हुए | जब तक मुझे भी नींद नहीं गई मैं उसकी गर्म साँसों को महसूस करता रहा |  

जब आँख खुली तो अहसास हुआ की मैं अकेला उस चबूतरे पे पड़ा हूँ | और जहाँ कल्पना थी वहां बस एक लाल दुपट्टा है | मेरा दिल बहुत देर तक धढ़ धड़ाता रहा | फिर चुप हो गया | वो घटना मुझे अजीब नहीं लग रही थी | ही कुछ बुरा | कुछ खोने का अहसास | मैं बस कोई आहट अपने आस पास महसूस कर रहा था | मैंने वो दुपट्टा उठाया उसमें कल्पना के होने की महक थी | ऑलमोस्ट शाम होने वाली थी | मैंने घर की और चलना शुरू किया

मैं कॉलोनी के गेट पर पहुँचा | वहां वही वीरानी थी जो सुबह मैं छोड़ गया था | काका आग जलाये अकेले बैठे थे | मैं उनके पास से गुजर रहा था |

"ये तो कल्पना का दुपट्टा है |" - काका ने इसके अलावा कुछ और कहा होता तो शायद मेरे कानों को सुनाई ही पड़ता |
"कौन कल्पना?"

"होती तो तेरी उम्र की होती, थी एक मासूम बला |" - कहते हुए उन्होंने एक लकड़ी अलाओ में डाल दी |