"फिर,
- मुझे उसकी बातें अलग ही सुकून दे
रही थीं | मैं चाहता था वो बस
बोलती रहे | उसने चलना बंद कर दिया सहसा
मुझे भी रुकना पड़ा
| इस एवज में की वो क्यों
रुकी मैं उसकी तरफ पलटा | वो तपाक से
मेरे नज़दीक आ गई | इतने
करीब की मैं मैं
उसकी साँसों की गर्माहट महसूस
कर सकता था |
"फिर
तुमने मुझे अपनी और खींचा, - कहते
हुए वो और नज़दीक
आ गई |
"हम
एक दूसरे की साँसों से
जीने लगे थे | मुझे लग रहा था
की ठण्ड के मौसम में
गर्माहट से भरा पेड़
मुझे छाया दे रहा है
| वो जितनी मेरे नज़दीक आती जा रही थी
उसकी आवाज़ उतनी मद्धिम मगर जादूभरी होती जा रही थी
| हमारे होंठों के बीच क्षण
भर जो फ़ासला बचा
था अब वो मुझे
ही तय करना था
| सो उसके बताये हिसाब से मैंने दोबारा
ठीक वैसे ही अपना हाथ
उसके गाल पर रख दिया
और अंगूठे से उसका होंठ
सहलाने लगा |
"फिर
- मैंने
कहा |
"पता
नहीं, उसके बाद पूरी रात मैंने तुम्हारी साँसों को महसूस किया
है |
हम
सुनसान सड़क पर अकेले थे
| दूर दूर तक हवाओं की
सांय सांय के शिव कोई
और शोर नहीं थे | आस पास के
घने ऊँचे पेड़ों पर बैठे पंछी
हमें ताड़ रहे थे | दूर दूर तक गहरी वीरानी
थी | इतनी वीरानी में मेरे भीतर गहरा रोमांस उमड़ रहा था | मैं एकदम उस दृश्य के
करीब था जिसे में
हमेशा महसूस करना चाहता था | मैं अगर थोड़ी देर और करता तो
चूक जाता इसलिए मैंने अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए
|
एक
क्षण बाद वो तेज़ी में
मुझसे दूर हठी | एक पल के
लिए मुस्कुराई और भाग पड़ी
| मैं उसके पीछे पड़ा | उसकी मुस्कान हसीं में तब्दील हो गई | वातावरण
में उसकी हसीं की आवाज़ गूँज
रही थी | भागते भागते वो नदी किनारे
पहुँच गई | मैं वहाँ नदी देखकर असमंजस में था |
"यहाँ
नदी भी है?"
"हाँ,
तुम्हे नहीं पता? आओ - उसने मेरा हाथ पकड़ा और खींचकर किनारे
ले गई | मैं खड़ा खड़ा सब देख रहा
था | वो बैठ गई
ठीक किनारे और उसने अपने
दोनों पैर नदी में डाल दिए |
"बैठो
बैठो |" - मैं उसके पास बैठ गया |
"मैं
बहना चाहती हूँ नदी की तरह |
"आसपास कोई नहीं होता | उस अकेलेपन में थोड़ी सी किसी के न होने की कमी खलती है | फिर एक आता है, दूसरा आता है, तीसरा आता है.. आपके आसपास बहुत सारे लोग हो जाते हैं | तलब, जैसे किसी नशेड़ी को दारू और जुआरी को दाव लगाने की होती है ठीक वैसे ही मुझे फिर से अकेला हो जाने की होती है | अपने अलावा किसी और की संगति भाती ही नहीं है | पहली बार तुम्हारे आसपास होने पर लगा नहीं की कोई और है |"
"पर मुझमें ऐसा क्या है ?"
"सादगी |"
"वो तो सब में होती है" - उसने अपनी पलकें नम कीं |
"सब में नहीं होती है !"
वो चलकर मेरे पास आई, मेरे बगल में बैठकर उसने अपने हाथ मेरे कन्धों पर रख लिए |
"होती है, पर तुम्हें सबके अंदर दिखाई नहीं देती |"
"हो सकता है", पर क्या वाकई ऐसा संभव है की दुनिया में बेबकूफ न हों |"
वो खिलखिलाकर है दी | और खूब देर तक हस्ती रही |
"पर ऐसा भी तो हो सकता है की कोई और भी तुम्हारे बारे में ऐसा सोचता होगा |"
"मैं यह जनता हूँ |"
"फिर ऐसे सवाल क्यों करते हो?"
"मैं सवाल नहीं कर रहा था |"
"तो?" - इस बात ने उसके ज़ेहन में सवाल खड़ा कर दिया था |
"मैं तो इज़हार कर रहा था |"
"क्या?"
"दिक्कत तो यही है की कोई समझ नहीं पाता, और मैं सालों से उसे ढूंढ रहा हूँ जो समझ सके |"
उसने दोनों हाथों से मेरे गाल अगल बगल से पकड़ लिए | और मेरी आँखों में झाँकने लगी | उसका मेरी आँखों में झांकना इतना सुन्दर अहसास था की उसकी छुअन से मैं उड़ रहा था | पहली बार मैंने खुद को किसी के छूने से उड़ते हुए महसूस किया |
"मैंने सपने में कभी कोई चेहरा नहीं देखा बस किसी का होना महसूस किया है |"
एक क्षण और मेरी आँखों में झाँकने के बाद वो मेरे कसकर गले लग गई | बाहों में होना मुझे सबसे सुखद लगता है | 'मुझे लगता है की दुनिया सिर्फ उतनी है जितनी आपके लिए कोई बाहें लिए बाहें फैलाता है |'
"मैं
तुम्हें चूमना चाहती हूँ!”
उसका
निचले होंठ में दुनिया
की सबसे महीन लालिमा
थी | उसकी पलकें आहिस्ता
झुकी, हवा की सांय
सांय भी अब मेरे
कानों को नहीं छू
रही थी | मैं अक्सर
सोचता हूँ की कुछ
क्षण कितने महीने होते हैं, एकदम
अलहदा | प्रकृति की रिदम से
अलग कोई नई तरंग
जब आपके बीच आती
है उसकी सुंदरता बेहिसाब
होती है | मैं किसी
भी कीमत पे इस
क्षण को जाने नहीं
दे सकता था | वातावरण
की ठंडक मद्दिम पढ़
गई थी | फैली थी
बस उसके साँसों की
गर्माहट, चारोतरफ |
"तुम्हारी
साँसे काँप रहीं हैं
|" - मैंने मध्दिम सुर में उससे
कहा |
"साँसे
जब सच होती है
तो वो कांपने लगती
है |"
"सच
|"
"मैं
तुम्हारी साँसों को सुन रही
हूँ और वो मुझे
खुद से कहीं ज़्यादा
सच्ची लग रही हैं
|" - उसने कहा |
मेरा
हाथ उसके दाएं वक्ष
के इंच भर नीचे
रखा था, उँगलियाँ उसकी
पीठ पर थीं | उसने
अपने दोनों मेरे कंधे के
ऊपर रखे थे और
आहिस्ता आहिस्ता अपना अंगूठा मेरी
गर्दन पे रगड़ रही
थी |
"तुम्हारी
कल्पना की दुनिया कौन
है?" - उसने मुझसे पुछा
|
"तुम
|" - मैं कहा |
उसकी
आँखों में नमी थी
| उसने मुझे चूमा | हम
खूब देर एक दूसरे
को चूमते रहे | वो
उठकर नदी की और
भागी | किनारे के वो जगह
उसे पता थी जहाँ
वो पैर लटकाकर बैठ
सके और पानी उसके
पैरों को छूता हुआ
जाए | मैं उस छुअन
के बाद जगह से
उठ न सका | किसी
भी अहसास से तुरंत बाहर
आना मेरे बूते का
नहीं है | उसने मेरी
ओर मुड़कर देखा | वो मुस्कुरा रही
थी | मैं उठकर उसके
पास गया |
"तुमने
पास वाला पहाड़ देखा
है?" -उसने पूछा |
"हाँ
|" - मैं अब तक बैठा
नहीं था |
"मुझे
लेकर चलोगे?"
"क्यों
नहीं |"
"तुम्हे
पहाड़ पसंद हैं?"
"बहुत
|" - वो मेरी आँखों में
देखने लगी |
"तुमने
कभी अपनी आँखें देखीं
हैं?"
"क्यों?"
"तुम्हारी
आँखों में पहाड़ के
होने का अहसास होता
है |" - आहिस्ता उसकी पलकें हिल
रही थीं |
"और
नदी?" - मैंने पूछा |
"नदी
तो तुम्हारे साथ होने के
अहसास में है |"
"तुम्हें
क्या दिखता है मेरी आँखों
में? - वह बोली |
"समंदर
|"
"बस?"
"आसमान
भी दिखता है |" - मैंने उसकी उत्सुकता टूटने
नहीं दी |
"झूठे,
मेरी आँखें इतना सब कुछ
कैसे समेट पाएंगी? कुछ
छोटा नहीं दिखता?"
"दिखता
है न?"
"वही
तो मैं कब से
पूछ रही हूँ |"
उसके
इस तनिक भर चिड़चिड़ेपन
पर मैं मुस्कुरा दिया
| मासूम गुड़िया लगती है जब
उसकी नाक पे थोड़ा
सा चिड़चिड़ापन आता है | मुझे
नहीं पता था वो
क्या सुन्ना चाहती है |
"अरे
बताओ न? क्या दीखता
है?"
"चिड़िया
|" - मैंने कहा |
"मुझे
पहाड़ चढ़ना है |"
"चलो
|"
और
हम पहाड़ की तरफ
चलने लगे | एक आम के
पेड़ के नीचे से
गुजरते हुए उसने कच्ची
कैरी उठा ली |
"थोड़ा
सा नमक और मिर्च
होती तो कितना अच्छा
होता |"
"हाँ
|"
"मेरे
मुँह में पानी आ
गया, तुम खाओगे?"
मैंने
हाँ में सर हिलाया
| वो पेड़ के तने
के पास गई और
कैरी को डंठल की
ओर से रगड़ने लगी
| फिर उसने अपने दांतों
के बीच कैरी को
रखकर खूब ज़ोर से
कतरा | एक भाग उसने
मुझे दिया और गोई
से तने पर उसने
दिल बनाया |
"इस्पे
हमारा नाम लिख दूँ?"
"हाँ
|"
उसे
तो मेरा नाम पता
ही नहीं था | उसकी
उत्सुकता के कारण में
कुछ बोला नहीं | मैं
बस उसका मेरी ओर
मुड़ने का इंतज़ार कर
रहा था ताकि मैं
उसे अपना नाम बता
सकूं | उसने 'देव' लिखा और
उसके बगल में कल्पना
|
"मैंने
तो तुम्हें अपना नाम बताया
ही नहीं |"
"तुम्हें
तो हमारी बहुत सारी बातें
पता ही नहीं हैं
|"
"हाँ,
क्योंकि हमने बातें की
ही नहीं हैं |"
"की
हैं |"
"कब?"
"सपने
में |"
"मैंने
कहा न, मुझे सपने
याद नहीं रहते | बस,
सपने में जो गुजरा
है उसका अहसास साथ
रहता है |"
"कोई
बात नहीं |" - वह बोली |
"थोड़ा
भाग लें | पहाड़ बहुत दूर
है |"
"हम
भागेंगे?" -कितना बचपना था उसमें |
"क्यों
नहीं?"
"क्योंकि
चलना बेहतर है |"
उसने
फिर से मेरे अगल
बगल अपनी बाहें डाल
दीं | मुझे उसकी ये
आदत सबसे अच्छी लगती
है | किसी के लिए
बाहें फैलाना दुनिया की सबसे अलहदा
बात है | मुझे हर
उस व्यक्ति से प्यार है
जिसकी बाहों में मेरे लिए
जगह है |
"प्लीज,
चलो न थोड़ा भागते
हैं, फिर पहाड़ पर
चढ़कर ज़ोर से चिल्लायेंगे
|"
मुझे
भागने से ऐतराज़ नहीं
था पर मैं उसके
साथ बिलकुल भी वक़्त, वक़्त
की गति से ज़्यादा
नहीं बिताना चाहता था | मैं उसी
गति से चलना चाहता
था जिस गति से
समय चलता है | क्योंकि
वो सच है या
झूठ | असल है या
नहीं मुझे इसका कोई
तकाज़ा नहीं था | उसने
मेरा हाथ पकड़ा और
भागने लगी | हम काफी देर
भागते रहे और पहाड़
के करीब पहुँच गए
| हमारी साँसे फूल गई थीं
|
"भागने
में मज़ा आता है
न?" - उसने
अपने दोनों घुटनों पे हाथ रखे,
वो खड़े खड़े ही
सुस्ता रही थी |
"बहुत
|"
"फिर
भागने में इतना आनाकानी
क्यों कर रहे थे?"
"मेरी
आदत है |"
"आदत
तो नहीं हैं |"
"तुम्हें
ऐसा क्यों लगता है?"
"तुम्हें
चूमते वक़्त तो तुमने
कोई आनाकानी नहीं की |"
"मैंने
हाँ भी तो नहीं
कहा था |"
"कुछ
न कहना तो हाँ
ही होता है |"
"कुछ
न कहना न भी
तो हो सकता है
|" - उसके चेहरे पर उदासी आ
गई |
"पर
उस वक़्त 'हाँ' ही थी
|" - मैंने सिचुएशन को सँभालने की
कोशिश की |
वो
मुँह बिगाड़े अकेली ही पहाड़ की
तरफ भागी | उसने एक बार
भी मुड़कर मेरी तरफ नहीं
देखा | एक पल में
सोचता रहा | फिर बहुत तेज़
भागा | मैंने उसे भागते हुए
पीछे से पकड़ लिया
| वो रुक गई | दरअसल
वो थम गई थी
|
"मैंने
तुम्हारे बारे में एक
बात महसूस की है?"
उसने
मेरी बात का कोई
जबाब नहीं दिया | वो
बस चुप थी | मैंने
उसे अपनी तरफ घुमाया
| वो नज़रें चुरा रही थी
| मैंने उसकी आँखों में
झाँका, पर उसने नज़रें
नहीं मिलाई |
"तुम
तो मेरी इक्छा हो,
अनिक्षा कैसे हो सकती
हो?"
उसकी
आँख से एक कतरा
आँसू ज़मीन पे गिरा
| मैं इसके लिए कतई
तैयार नहीं था | मुझे
तो किसी के आंसू
पोंछने भी नहीं आते
| मैंने उसकी आँख के
नीचे अंगूठा रगड़ा, बहुत आहिस्ता | और
कसकर उसे बाहों में
भर लिया |
"मेरी
बात अगर बुरी लग
गई हो तो माफ़
कर दो, मेरा अंदेशा
उस वक़्त से नहीं
था | वो बात मेरे
जीवन के विषय में
थी |"
"नहीं,
बात वो नहीं है
|"
"फिर
क्या बात है |"
"पता
नहीं, कुछ है जो
खामोश रखना चाहता है
|"
कोई
कभी बजह खामोश रहने
की ज़िद करता है
तो मुझे बिलकुल अच्छा
नहीं लगता | कोई किसी का
मन कैसे पढ़ सकता
है | मैं कैसे किसी
की उदासी जान सकता हूँ
| खामोश उदासी एक पहेली के
जैसी होती है | और
पहेलियों के हल निकाल
पाना मेरे बूते का
नहीं है क्योंकि जब
तक पहेली वाज़िब न हो उसमें
एनर्जी खपाना मुझे जायज़ नहीं
लगता | वो कसकर मेरे
गले लगी रही | ऐसा
लग रहा था जैसे
सूरज हमें निहार रहा
हो | गले मिलना कितना
होता है | मेरा बस
चले
तो मैं एक पल
के लिए भी उसकी
बाहों से बाहर न
आऊं |
"ख़ामोशी
अच्छी होती है या
बुरी?"
"अच्छी
|" - वो तपाक से बोल
पड़ी |
ख़ामोशी
से मेरा गहरा लगाव
है | पर मैंने कई
बार महसूस किया है की
ख़ामोशी कभी कभी सब
कुछ ले डूबती है
| लेकिन कई बार ख़ामोशी
कुछ बचाकर भी रखती है
| अब हमारे बीच अगले पल
की ख़ामोशी कुछ ले डूबने
वाली थी या बचाने
वाली थी इसका कोई
अंदाज़ा मुझे नहीं है
|
"ख़ामोशी
से तुम्हारा रिश्ता कैसे बना |"
"कुछ
रिश्ते विरासत में मिलते हैं,
ख़ामोशी मुझे विरासत में
ही मिली है |" - उसने
कहा |
"क्या
हमें एक दूसरे को
जानना चाहिए?"
"क्या
घर-परिवार, प्रोफेशन, शौक और आदतों
की बातें कर लेने से
हम एक दूसरे को
जान लेंगे |"
"नहीं
|"
"तब
तो मुझे कोई दिलचस्पी
नहीं हैं |"
मुझे
भी नहीं थी | और
मुझे कभी नहीं होती
| मैं तो चाहता हूँ
कोई मुझसे दुनियादारी की बातें करे
ही न | कहीं तीसरे
धरातल की बातें हो
| हम अजनवी होते हुए एक
दूसरे के ज़्यादा करीब
होते हैं | मुझे लगता है,
एक दूसरे को जानना हमें
दूर करता है | किसी
को हम जितना जानते
जाते हैं उतना उससे
दूर होते जाते हैं
|
"हमें
परिचय की आव्यशकता क्यों
होती है?" - उसने सवाल किया
|
"शायद
मैं इसका जबाब नहीं
दे सकता | क्योंकि मैंने कभी अपना परिचय
किसी को दिया ही
नहीं |" - मैंने कहा |
"वापस
चलें |"
"लेकिन
पहाड़ तो चढ़ लें
पहले |" - मुझे उसकी इच्छा
याद थी |
हम
दोनों एक दूसरे से
अब तक चिपके थे
| मेरी टीशर्ट पर पसीने की
कुछ बूंदे उकर आई थीं
| उसकी त्वचा से हलकी गर्माहट
आ रही थी | ठंढ
के मौसम में हमारे
भीतर इतनी आग बची
थी |
"चलें?"
- मैंने फिर से कहा
|
"चलो
|"
हम
पहाड़ चढ़ने लगे | इस
दौरान हमने कोई बात
नहीं की | यह ख़ामोशी
सुनने का वक़्त है
| बीच बीच में वो
मेरी और देखती और
मुस्कुराती एवज़ में, मैं
भी यही कर रहा
था | ख़ामोशी से बड़ी कोई
आवाज़ नहीं होती | कुछ
देर में हम पहाड़
की चोटी पर पहुँच
गए थे | पहाड़ पर
पहुँचते ही वो ज़ोर
ज़ोर से मेरा नाम
पुकारने लगी | यह मेरे लिए
बहुत अजीब था | किसी
ने मेरा नाम कभी
नहीं पुकारा इस तरह |
"तुम
भी चिल्लाओ?"
"क्या
|"
"बुद्धू,
कुछ भी | इसमें इतना
सोचना क्या! दिल से जो
आवाज़ आ रही हो
|"
"मेरे
दिल की कोई आवाज़
मुझे सुनाई ही नहीं देती
|"
"फिर
क्या सुनाई देता है |"
"मैं
बहरा हूँ |" - इस बात पे
मुस्कुराते हुए उसने आँखें
तरेर दीं |
"तुम
बहरे हो न? गूंगे
तो नहीं हो? चिल्लाओ
|"
"मेरी
ऐसी कोई अंदरूनी इच्छा
नहीं है, मुझे पहाड़
की चोटी पे ख़ामोशी
अच्छी लगती है |"
"ज़्यादा
ख़ामोशी ज़िंदगी में हो तो
वो ज़हर बन जाती
है, थोड़ा सा शोर
अपने साथ रखना चाहिए
|" - मुझे लगा वो मुझसे
मेरी ही ज़बान बोल
रही है |
"तुम्हारी
आवाज़ काफी है, मैं
इसे सुन्ना चाहता हूँ बस | सिवाय
उसके कुछ भी नहीं
|"
वो
दो कदम मुझसे दूर
उस और गई जहाँ
गहरा सन्नाटा था |
और ज़ोर
ज़ोर से चिल्लाने लगी
|
अच्छा हुआ वो बहुत
ज़िद्दी नहीं है |
कभी
कभी ख़ामोशी इस कदर ऊपर
चढ़ जाती है की
मैं कुछ भी बोल
ही नहीं पाता फिर
चिल्लाना तो बहुत दूर
की बात है |
"इधर
आओ |" अरे, आओ न!
-उसने दो बारी बढ़ी
उत्सुकता से बोला |
"वहाँ
देखो |" - वह मुझे कुछ
दिखाना चाह रही थी
|
मैं
उसके पास गया | पहाड़
के दूसरी तरफ झील थी
| झील पर धुएं की
एक हलकी चादर बिछी
थी | झील झील नहीं,
आसमान लग रही थी
| लग रहा था समंदर
पर बादल तैर रहे
हों |
"हम
वहां चलें?" - थोड़ी ढलान क्रॉस
करने के बाद, एक
किनोर से हम और
करीब से देख सकते
थे | पर वहाँ जाना
रिस्की था |
"सुनो,
ढलान तीखी है | हम
फिसल गए तो डूब
जायेंगे |"
"तो
क्या हुआ, डूबेंगे तो
दोनों डूबेंगे |" -कहते हुए वो
मुस्कुरा रही थी ।
प्रेम
में कोई कितना आपके
साथ चल सकता है
इसे किसी कहे में
नहीं आँका जा सकता
| पर कहे गए साथ
की बात दिल को
बहुत अच्छी लगती है | उसका
मेरे साथ होना सचमुच
कल्पना ही था क्योंकि
यथार्थ में अब तक
किसी के भी सन्दर्भ
में कहूँ तो न
मैंने किसी का ऐसा
साथ महसूस किया है और
न ही किसी का
कहा गया दिल को
भाया है | ये वो
बात है जो जागते,
सोते, जीते हर मायने
में मुझे कहीं भी
खींच के ले जा
सकती है | साथ की
बात जादू होती है
|
मैं
बिना कहे उसकी बात
की तरफ खींचा चला
गया | मैं उस ढलान
की और चलने लगा
|
"अरे
बुद्धू, मेरा हाथ तो
थामो |" - उसने मेरी आँखों
में झांकते हुए कहा | मैंने
उसका हाथ थमा |
"तुम्हें
भी सहारे की ज़रूरत होती
है |"
"अब
तक तो नहीं थी,
पर तुम्हारे मिलने से होने लगी
है | सहारा दोगे?"
"हाँ
|"
कितनी
सच्ची बात थी | हमें
किसी के सहारे की
कभी ज़रूरत नहीं पड़ती | सच
में | प्रेम ही है जब
हम किसी की कमी
महसूस करने लगते हैं
| सहारा वो मांग रही
थी या दे रही
थी! ये असमंजस की
बात नहीं है क्योंकि
दरअसल हम दोनों को
एक दूसरे के सहारे की
ज़रूरत थी |
हम
झील के किनारे पहुंचे
वाकई कितना सुन्दर दृश्य था | कभी कभी
ज़िंदगी सपना हो जाती
है और सपना ज़िंदगी
जीने लगता है | वो
डरती जा रही थी
और बढ़ती जा रही
थी | हम एकदम किनोर
तक गए | वहां से
खूब देर हमने झील
में झाँका, बादलों से बातें की
|
"वहां
चलो |" - उसने कहा |
वहां
एक पेड़ था | एक
सुर्ख पतली पगडंडी थी
| हम उस पहाड़ की
पगड़न्ड़ी पे चलने लगे
| वो इकलौता पेड़ था उन
झाड़ियों के बीच, ज़मीन
पर लालिमा बिछी थी और
अब भी पेड़ में
उतने ही फूल बाकि
थे जितने ज़मीन पे पड़े
थे | उसने भागकर पेड़
की सबसे निचली टहनी
पकड़ी और उसे ज़ोर
ज़ोर से हिलने लगी
|
"अरे
जल्दी आओ |" -उसने मुझे कहा
|
मैं
उसके पास गया | उसने
एक हाथ से मुझे
उस डाली के नीचे
खींच लिया और टहनी
हिल|ने लगी | कुछ फूल हमारे
ऊपर गिरे, दोनों के | उसने अपने
हाथ फैलाये और आँखें बंद
करके अपने ऊपर फूलों
की बर्षा महसूस करने लगी | उसने
आँखें खोली वो मेरी
तरफ मुढ़ चुकी थी
| मैंने बिना कुछ सोचे
समझे अपनी तरफ खींच
लिया और बिना देर
किये उसके होंठों को
बेतरतीबी से चूमने लगा
| वो साथ देने में
कमाल थी चाहे मामला
कोई भी हो |
"मुझे
नींद आ रही है
|" -कितना अजीब था उसका
ये कहा |
अभी
एक पल पहले ही
हिरणी जैसी उछल कूद
कर रही थी और
अब सोना चाहती है
| खुले आसमान के नीचे, ज़मीन
पर, भय नहीं है
उसे कोई | उसकी ये कल्पना
कितनी अलग है! मैंने
अपने आस पास नज़रें
दौड़ाईं | वहाँ एक चबूतरा
था | मैं उसे चबूतरे
की तरफ ले जाने
लगा | अब वो एकदम
से आलस से भर
गई थी | उसकी पैर
भले ज़मीन पर थे
पर असल में मैंने
उसे गोद में उठाया
हुआ था | लोरते लोरते
वो मेरे साथ उस
चबूतरे तक गई | उसने
मेरी शर्ट के बटन
खोले और अपना चेहरा
मेरे सीने पर रख
कर छुपा लिया | मुझे
कस कर पकड़ रखा
था उसने |
"घर
चलें?" - मैंने उससे पूछा |
"कल्पना
कभी घर नहीं जाती
|" - उसने शर्ट के बाहर झाँककर कहा |
"और
कल्पना को नींद आती
है ?" - मैंने पूछा |
"बहुत,
कल्पना थक गई है, कल्पना सोना चाहती है
|" - लग रहा था जैसे
उसे अचानक किसी चीज़ का
नशा हो गया हो
|
"यहां?"
- मैंने सवाल किया |
"हाँ,
कल्पना के लिए तो
आसमान ही छत है
|"
"एक
बात कहूँ?" - दो पल रूककर
वो बोली |
"हाँ
|" - मैंने कहा |
"कल्पना
को सोने मत देना
|" - बस इतना कहने के
बाद वो कुछ नहीं
बोली | और कसकर गले
लगी रही |
"अब
तो मुझे भी नींद
आ रही है |" - कुछ
पलों के मौन के
बाद में बोला |
"चलो,
दोनों एक दूसरे की
बाहों को ओढ़कर सो
जाते हैं |" - उसने फुसफुसाकर कहा
|
मैंने
उसे गोद में उठाया
और उस चबूतरे पर
लिटा दिया | उसकी आँखें बंद
थीं | वो सचमुच गहरी
नींद में लग रही
थी | जैसे ही मैं
उसकी बाहों से एक पल
अलग हुआ उसने अपनी
आँखें हलकी खोलीं और
बाहें मेरी तरफ फैला
दीं | मैं उसके बाहों
में गस्त में प्रवेश
कर गया | हम दोनों एक
दुसरे को कसकर बाहों
में भरकर लेटे रहे
|
"अच्छा
अब कब मिलोगे?"
"क्या
मतलब?"
"मतलब,
आज जब हम वापस
लौटेंगे उसके बाद?"
"हम
साथ में वापस लौटेंगे,
मेरे कमरे पे | फिर
मेरा कमरा हमारा घर
हो जायेगा |"
"तुम्हें
पता है?" - और वो रुक
गई |
"क्या?"
"जब
तुम चूमते हो तो लगता
है किसी ने आत्मा
चूम ली हो |" - नींद
हमें चरों तरफ से
घेर चुकी थी पर
अभी हमने हथियार नहीं
थे |
"और
तुम्हे पता है जब
तुम मेरे इर्द - गिर्द
अपनी बाहें फैलाती हो तो लगता
है जैसे मैं ज़िंदगी
में आ गया हूँ
फिर से | मैं जीने
लगता हूँ |"
"मुझे
तुम्हारी साँसों की गर्मी महसूस
करनी है, और पास
आओ न |" - कुछ देर के
मौन के बाद आहिस्ता
उसकी आवाज़ आई |
"इतना
|" - हमारे होंठ एक दुसरे
के होंठों को छूने लगे
थे |
"हाँ
|"
"मुझे
अपनी बाहों की कैद से
निकलने मत देना, और
कसकर पकड़ो |" - मैंने उसे और जकड़
लिया |
"कभी
नहीं |" -मैंने कहा |
"मेरी
आँखों में क्या दिखा
रहा है?" -उसने पूछा? उसने
यह कहते हुए नींद
के आगे अपने हथियार
डाल ही दिए थे
|
"आसमान
|" मैंने कहा |
"तुम्हारी
आँखों में धरती है
|" - वो बोली | और वो सो
गई |
मैंने
उसे चूमा | मैं भी नींद
के सामने निहत्था होना चाहता था
और उसके सही मायने
में उसकी बाहों में
होते हुए | जब तक मुझे
भी नींद नहीं आ
गई मैं उसकी गर्म
साँसों को महसूस करता
रहा |
जब
आँख खुली तो अहसास
हुआ की मैं अकेला
उस चबूतरे पे पड़ा हूँ
| और जहाँ कल्पना थी
वहां बस एक लाल
दुपट्टा है | मेरा दिल
बहुत देर तक धढ़
धड़ाता रहा | फिर चुप हो
गया | वो घटना मुझे
अजीब नहीं लग रही
थी | न ही कुछ
बुरा | न कुछ खोने
का अहसास | मैं बस कोई
आहट अपने आस पास
महसूस कर रहा था
| मैंने वो दुपट्टा उठाया
उसमें कल्पना के होने की
महक थी | ऑलमोस्ट शाम
होने वाली थी | मैंने
घर की और चलना
शुरू किया |
मैं
कॉलोनी के गेट पर
पहुँचा | वहां वही वीरानी
थी जो सुबह मैं
छोड़ गया था | काका
आग जलाये अकेले बैठे थे | मैं
उनके पास से गुजर
रहा था |
"ये
तो कल्पना का दुपट्टा है
|" - काका ने इसके अलावा
कुछ और कहा होता
तो शायद मेरे कानों
को सुनाई ही न पड़ता
|
"कौन
कल्पना?"
"होती
तो तेरी उम्र की
होती, थी एक मासूम
बला |" - कहते हुए उन्होंने
एक लकड़ी अलाओ में
डाल दी |