Sunday, 3 November 2019

खिड़की

वो अक्सर अपने घर की खिड़की पर खड़ी रहती थी | मतलब हो सकता है मुझे ऐसा इसलिए भी लगता हो क्योंकि मेरी अक्सर उससे मुलकात उस खिड़की पर ही हुई थी | खिड़की मुझे बेहद पसंद थी | खिड़की से मेरा संबंध बहुत गहरा था | इतना की कभी भी बस से लेकर ट्रैन तक के सफर में, मैं हमेशा खिड़की के पास ही बैठता था | अगर बस में मुझे खिड़की वाली सीट नहीं मिलती थी तो मैं बस छोड़ देता था | मैं अगली बस का इंतज़ार करता था ताकि खिड़की के पास बैठ सकूं | उसकी शायद यह एक बड़ी वज़ह थी की यात्राओं के दौरान बस या ट्रैन कोई भी हो, भीतर का माहौल मुझे कभी अच्छा नहीं लगा |

खिड़की के कारण में ट्रैन या बस के अंदर होते हुए भी बाहर होता था | खिड़की दूसरी दुनिया में होने का आभास दिलाती है | खिड़की के पास खड़े होकर हम दो दुनियाओं में एक साथ हो सकते हैं | दो दुनियाओं में एक साथ रहने का खिड़की के अलावा कोई और दूसरा रास्ता नहीं है |

खिड़की से मेरे रिश्ते की नींव बचपन में ही पड़ गई थी | बचपन के दिनों में, मैं यात्रा के दौरान बहुत उल्टियां किया करता था इसलिए पापा मुझे अक्सर खिड़की के पास बिठा दिया करते थे | बड़े होते होते उल्टियां करना तो बंद हो गया लेकिन खिड़की के पास बैठना बंद नहीं हुआखिड़की से मेरा रिश्ता और मजबूत होने का कारण तुम थीं | हमारी मुलाकात का इकलौता जरिया वो तुम्हारे घर की खिड़की मुझे बहुत पसंद थी जहाँ हम घंटो खड़े खड़े बतियाया करते थे | उस खिड़की के करीब खड़ा होकर मुझे कभी नहीं लगता था की मैं तुम्हारे घर के बाहर हूँ मुझे हमेशा यही लगता था की मैं तुम्हारे साथ, तुम्हारे ही घर में बैठा तुमसे बातें कर रहा हूँ |

मुझे लगता है हमारे प्रेम की दो पारियाँ हैं | पहली पारी में तुम खिड़की के इस पार आने का अभ्यास करती रहीं पर शायद सकीं | मैंने कई बार कोशिश की कि तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम्हे बाहर खींच लूं पर कभी हाथ बड़ा सका | वो पारी बहुत छोटी थी | छोटी होना गुनाह नहीं है | बारीक़ होना गुनाह है | पहली पारी बहुत बारीक थी एक दम महीन | तुमने उसे अपने हाथ से खिसका दिया और मैं संभाल सका | मैंने देर नहीं की थी | यह तुम्हारी जल्दबाजी थी की पारी बनते बनते बिगड़ गई |

"तू ये घंटों घंटों खिड़की के पास क्यों खड़ा रहता है |"- काया ने मुझे कहा |
"तुझे कोई परेशानी है |" - मैंने पलटकर हलके गुस्से में कहा | कोई खिड़की के पास खड़े होने को लेकर मुझसे कुछ कहता है तो मैं बर्दास्त नहीं कर पाता |
"आँखें क्यों दिखा रहा है, तेरी भलाई के लिए पूछा |" - काया ने कहा |
"इसमें मेरी कौनसी भलाई है ?" - मुझे उसकी यह बात बेहूदा लगी |
"पागलों सा तो रहता है | क्या भरोसा कहीं खिड़की से कूंद के मरने का प्लान-व्लान बना रहा हो |"
"तुझे शौक हो मरने का तो तू मर, मैं क्यों मरूं |" -अब मेरा हल्का गुस्सा भी फू हो चुका था |
"नहीं बेटा मैं एकदम सीरियस हूँ | अगर तेरे दिमाग में कुछ चल रहा है तो बोल दे खिड़की को हमेशा के लिए पैक कर देते हैं | -काया ने कहा |     
"तुझे फेंक दूँ खिड़की के बाहर |" - मैंने कहा | काया को खिड़की पैक करने वाली बात नहीं कहनी चाहिए थी | कहते हुए मेरा चेहरा लाल हो गया था |
"तू इस बात पे इतना भड़क क्यों जाता है |" - काया ने कहा |

मैं गुस्से में उसे घूर रहा था | मेरा चेहरा सुर्ख़ लाल हो चला था | काया की मुस्कान बातों बातों में उदासी में बदल गई थी | उसे मेरे अंदर की चुप्पी राज़ लगती थी वो खिड़की से मेरा रिश्ता जानना चाहती थी मैंने कभी बताया नहीं | यह सिर्फ काया की ही बात नहीं है | खिड़की से मेरा रिश्ता खिड़की और मेरे अलावा कोई नहीं जानता | 'काया', और वहां नहीं ठहरी, वो वहां से चली गई |  

उसके जाते ही मुझे दूसरी पारी का ख्याल हो आया | दूसरी पारी बहुत लम्बी थी | यह ठीक उस वक़्त शुरू हो गई थी | जब तुमने खिड़की के इस पार आने का प्रयास छोड़ दिया था | तुम्हारी कोशिश का ख़त्म हो जाना मुझे बिलकुल बुरा नहीं लगा लेकिन तुम्हारे प्यार का ख़त्म हो जाना बहुत बुरा लगा | कील दर कील दर्द काटता था की कोई भला बस ऐसे ही प्यार करना छोड़ सकता है | बेवज़ह | क्या कोई उसी खिड़की से किसी और को उन्ही नज़रों से देख सकता है जिससे कुछ देर पहले मुझे देखा जा रहा था |

दूसरी पारी के शुरू होने से अब तक हर बार मैंने खिड़की के उस पार जाने की कोशिश की | तुम्हारे पास आने की कोशिश की | तुम्हे प्यार करने की कोशिश की | हर बार | बार बार | पर जा सका | एक खिड़की को लांघना इतना मुकिल क्यों होता है? क्यों तुम्हारी तरह मैं भी उसी खिड़की से तुम्हारी जगह किसी और को नहीं देख पाता? दूसरी पारी में तुमने एक बार भी हाथ बढ़ाया होता तो सब कुछ बदल जाता | तुम्हारी पहली पारी की असफलता सफलता में बदल जाती | इस बार सिर्फ मैं नहीं हार रहा था | तुम भी हार रहीं थीं | फिर भी तुमने जीतने की कोशिश नहीं की | क्यों? हममें से किसी एक का हारना ही एक दूसरे  को हार जाना है | यह बात तुम्हें कभी समझ क्यों नहीं आई?

"संतरा खाएगा?'' - यह काया की आवाज़ थी |
वो अजीब ही है | मुझे दूसरी दुनिया से इस दुनिया में चुटकी बजाकर ले आती है |
"कैसा संतरे जैसा लाल हो रहा है | ऐसा क्या चलता है तेरे दिमाग में?" - संतरे की काली मुँह में दवाते हुए उसने कहा |
मुझे उसकी आदतों पर हंसी आती थी | कितनी बारीक और मीठी हरकतें थी उसकी | सबसे अलग |
"मौन व्रत है क्या?" - काया फिर बोली |
"तुझे कोई मतलब | तू वापस आई क्यों?" - मैंने कहा |
"पूछने आई थी तू कहीं सच में मरेगा तो नहीं | अब तक खिड़की के पास खड़ा है |" - काया बोली |
"हाँ मरूंगा |" - मैंने गुस्से में कहा |
"तुझे हुआ क्या है बोल | एकबार मुझे कह तो सही | क्या है उस खिड़की के पार जो तू वहां घंटो खड़ा रहता है |"- बहुत प्यार और चिंता से काया ने कहा |
"काया तुझसे एक बात पूछनी थी |" - मैंने कहा |
"हें....... अरे एक नहीं सौ बात पूछ |  इस बहाने तू बात तो करेगा |" - काया मुझे पकड़कर अपने पास ले गई |


पहली बार काया ने मुझे छुआ था | कब से वो मेरे साथ थी | आज मुझे उसके होने अहसास हुआ था | मुझे लगा अपने अतीत के कारण क्यों ही मैं काया से बदसुलूकी कर रहा हूँ | मैं उसका गुनेहगार हूँ | काया ने मेरा सर अपनी गोद में रख लिया | वो मेरे बालों में हाथ फेर रही थी | मैंने कुछ बोलना चाहा तो उसने चुप कर दिया कहा की दो मिनट सोचना बंद कर और चैन की सांस ले ले | मैं यहीं हूँ तेरे साथ हमेशा | मैं कभी कहीं नहीं जाऊंगी | मैं हमेशा तेरे साथ हूँ | मैं तेरी काया हूँ -सिर्फ तेरी | चारों तरफ गहरी चुप्पी थी | काया के होते हुए इतने चुप्पी पहले कभी नहीं हुई | उसकी गोद में मुझे गहरा सुकून मिला | ऐसा सुकून मैंने सालों बाद महसूस था |

"एक बात बोलूं तुझे?" - काया ने मुझे कहा |
"हाँ बोल |" - मैंने कहा |
"दोनों पारियों में ही तेरी कोई गलती नहीं थी | उसका नहीं पता जिसका तुझे ख़याल रहता है | तुझे जानती हूँ इसलिए कह रही हूँ |" - काया से यह सुनकर मैं भौचक्का था |
"तुझे पारियों के बारे में कैसे पता |" - मैंने पूछा |
"खिड़की के उस पार कोई खड़ा हो तो उससे अब कभी प्यार मत करना |" - उसने मेरी बात को नज़र अंदाज़ किया और खुद बोलती गई |
"तुम दोनों के बीच खिड़की तुम्हारी मुलाकात की सीढ़ी नहीं थी | वो तुम्हारे बीच की गाँठ थी जिसे तुम्हें खोलना था | तुम्हें जिसके पार जाना था | खिड़की से दूसरी दुनिया में झाँका तो जा सकता है लेकिन उस दुनिया में जाया नहीं जा सकता | वो लड़की जो उस खिड़की के पार खड़ी थी वो सांसारिक है दीवानी नहीं है | जब उसे अहसास हुआ होगा की वो खिड़की कूंद नहीं सकती तो उसने खिड़की के अपनी तरफ किसी को ढूंढा होगा या कोई उसे मिल गया होगा | तब तेरी पहली पारी ख़त्म हो गई होगी | फिर तेरी दूसरी पारी कितनी भी लम्बी क्यों हो तेरी हार निश्चित थी | तू दीवाना है | खुद्दार ऐसे ही मात खाते हैं | तू दूसरी पारी भी हार गया | आगे से ध्यान रखना जब भी कोई खिड़की अपने साथ लेकर आये उससे प्यार मत करना | हमेशा तू उसे हार जाएगा | मैं हूँ तेरे साथ खिड़की के इस पार, तेरा साथ देने के लिए |"- काया ने कहा |
"पर मैंने तो तुम्हें उसके और खिड़की के बारे में कभी कुछ नहीं बताया |" -मैंने कहा | मैं सोच में था की काया को यह सब कैसे पता चला |
"ज़्यादा मत सोच | मैं काया हूँ | तेरी काया, मुझे सब पता है |" - उसने मुस्कुराते हुए कहा |
"अभी तू एक गहरी सांस ले और वादा कर की तू उस खिड़की को हमेशा के लिए बंद कर देगा | वादा कर |" - काया ने अपना हाथ बढ़ाया |

मुझे लगा काया सही कह रही है | सबकुछ तो जानती थी वो मेरे बारे में | कितनी फ़िक्र थी उसे मेरी | कभी उसने अपनी फ़िक्र का अहसास मुझे नहीं होने दिया | वो सचमुच मेरी काया थी | सचमुच |

"अब चुपचाप गहरी नींद सो जा | और उठकर खिड़की बंद कर देना | अब कभी खिड़की के उस पार किसी से प्यार मत करना | ठीक है |" - मैंने अपना हाथ काया के हाथ में देकर उससे वादा किया |

मैं गहरी नींद सो गया | खूब देर सो लेने के बाद जब मैं उठा तो मुझे सबसे पहले काया की बात याद आई | मैं खिड़की के पास गया | खिड़की के उस पार काया थी | उसने मुझे जाने का इशारा किया | मैं काया की तरफ देख के मुस्कुराया | ये वो थी - काया | मेरी काया | काया धीरे धीरे धूमिल हो गई मैंने आहिस्ता आहिस्ता खिड़की बंद कर दी |