Wednesday, 11 April 2018

यादों के शहर में

मैं आज जब अपने कमरे में घुसा तो वो एकदम उदास था। ये मेरे वर्तमान का कमरा था। मेरे वर्तमान के कमरे को मेरी सबसे ज़्यादा फ़िक्र रहती है। शायद, ये कमरा मेरे जीवन की तरह ही है जो सिर्फ़ जीना चाहता है। मैं बिन कहे उसकी उदासी समझ गया। मैंने अपने क़दम पीछे की ओर बढ़ाए। मेरा कमरा खुश था अब उसकी आँखों में कुछ संभावनाएं पनप रही थीं । और मेरे भीतर भी।

उसके बाद मैं हर उस कमरे में गया जो पुराने थे। सीधे तौर पे कहूँ तो अतीत के कमरे। वे तमाम कमरे अतीत के कमरे थे जहाँ मैं कुछ बदलने आया था। मैं बहुत खुश था की अब कुछ न कुछ तो बदल जाएगा पर ऐसा नहीं हुआ। अतीत के कमरे में बदलने की कोई गुंजाइश कभी नही रहती। फिर मुझे लगा की मैं बेबकूफ़ हूँ। मुझे यहाँ आना ही नहीं चाहिए था। मुझे भविष्य के कमरे में जाना चाहिए था। भविष्य के कमरे में जीवन की तमाम संभावनाएं बाक़ी है।

पर वो कौनसा लम्हा था?, वो कौनसी बात थी?, वो कौनसी याद थी?, वो दरअसल था क्या? ....जो बार बार मुझे अतीत की तरफ़ खींचता है। जबकि मैं भविष्य की सारी संभावनाओं को जान गया हूँ। असल में अतीत के कमरे के दरवाज़े पर खड़ा होकर ही मैं यह लिख रहा हूँ। और सामने कुछ दूरी पर भविष्य का एक कमरा है। और अतीत सिर्फ़ मेरा नहीं हैं वो सबका होता है। अतीत तो उसका भी होगा। वो मेरा पूरा अतीत जानती है क्योंकि अतीत में वो मेरे साथ रही थी। और मुझे कुछ भी छिपाने की आदत नहीं हैं या यूं कहूँ तो मैं जीवन के मामले में थोड़ा खुला हुआ इंसान हूँ। पर मैं उसका अतीत नहीं जानता। मैं उसका भविष्य जानता हूँ। उसके भविष्य के कमरे में मेरे लिए जगह नहीं हैं। क्योंकि अपने लिए कोई भी जगह मैं ख़ुद तैयार करता हूँ। यह मुझे अच्छा लगता है। पर मेरे भविष्य के कमरे में वो रहेगी,थोड़ी-बहुत। क्योंकि मेरे अतीत में वो मेरे साथ थी।

भविष्य के कमरे में, मैं अतीत को साथ लेकर जाऊंगा। क्योंकि अतीत में किस्से होते है।

मुझे लगा सब कुछ सुलझ गया है। मैं थोड़ा मुस्कुराया। अब मैं भागकर अपने वर्तमान के कमरे के पास गया। मुझे लगा वो अब खुश होगा क्योंकि मैंने अपनी उलझन को सुलझा लिया है। और अब मैं खुश हूँ। मेरे चेहरे पर ख़ुशी देखकर वो खुश हो जाएगा। पर वर्तमान के कमरे में आने पर गड़बड़ हो गई थी। वहाँ अब सब कुछ स्थिर था। मैं ज़ोर से चिल्लाया " शिट". मेरे वर्तमान का कमरा, मेरे अतीत के कमरे में तब्दील हो चूका था और जिसे मैं अतीत का कमरा समझकर छोड़ आया था असल में, वही वर्तमान का कमरा था। मैं बिना सोचे समझे वापस भागा। अभी मैं रास्ते में ही था। और मुझे अपनी दूसरी उलझन समझ आ गई।

मुझे समझ आ गया था की मेरा वर्तमान का कमरा, बदला नहीं था वो वर्तमान का ही था। फिर, क्यों वो मुझे अतीत का कमरा लगा? शायद, इसलिए क्योंकि असल में, मैं अतीत के कमरे से कुछ लम्हें साथ ले गया था। ये हमारे लम्हें थे, जो हमने साथ साथ जिए थे। पर अब एक और नई उलझन पैदा ही गई थी। बीच रास्ते में खड़ा खड़ा मैं सोच रहा था की कहाँ जाऊं? 'क्योंकि किसी भी कमरे में जाना दरअसल वर्तमान में जाना है। अतीत का कोई कमरा कभी नहीं होता।'

जिस स्थिर कमरे को मैंने अतीत का कमरा कहा वो मृत है। क्योंकि वो प्रकृति के सिद्धांत के विरुद्ध है। जो स्थिर है वो एक जगह खड़ा नही रह सकता। क्योंकि जीवन खड़ा नहीं रहता वो सिर्फ़ चलता है। वो अपने ठहराव में भी चल रहा होता है। लगातार। निरंतर।

मैंने नज़रे उठाईं, मुझे ख़ुद पर हँसी आ गई। मैं व्यर्थ ही अतीत और वर्तमान के कमरे के बीच चक्कर काट रहा था। जबकि भविष्य का कमरा मेरे सामने ही खड़ा था।

यह हमारी आदत सी है। हम जान भूझकर भविष्य का कमरा नहीं देखते जबकि वो हमारे सामने होता है। और उसके दरवाज़े भी हमेशा खुले रहते हैं। हमें वर्तमान और अतीत में उलझने की आदत है। हमें प्यार करने की कम, प्यार में रोने की ज़्यादा आदत है। कम ही लोग यादों को जीते हैं। जबकि यादों को बहा देना व्यर्थ है। हमारे ख़ालीपन में यादें दोस्त होती हैं। और यादों से अच्छा कोई दोस्त नहीं होता क्योंकि वो हमारा चुनाव होती हैं । जिसे हमने अपने बनाए हुए सपने में, जिसे हम चाहते है उसके साथ जिया है।

बहरहाल, ये सब तो बातें है। ये जीवन की बातें हैं। जो बीच बीच में आ ही जाती हैं। अपने ठहराव को तोड़कर में भविष्य के कमरे की और चलने लगा। अब मैं भागा नहीं क्योंकि जीवन भागना नहीं चाहता। अब मैं चल रहा था। दोनों कमरे अब अतीत के कमरे हो गए थे और दोनों से मुझे यादें हाथ लगीं। तुम्हारी यादें रास्ते में मुझसे बात करना चाहती थीं। पर मैंने ठान लिया था की मैं कोई बात नहीं करूंगा क्योंकि बातों से हल निकल आता है।
और बातें करके, सामंजस्य बिठा के, एक दूसरे से वादे करके प्यार नहीं होता! प्यार के बीच तो कभी कोई बात होनी ही नहीं चाहिए। क्या प्यार कभी किसी समझोते की मांग करता है?, मुझे नहीं लगता। प्यार के बीच कभी कोई डर नहीं होता सिर्फ़ प्यार होता है।

अकेले चलने से यही होता है बीच बीच में बेवज़ह न जाने क्या क्या सोच लेते हैं हम। मैंने तुम्हारी यादों से बातें करना शुरू कर दिया सिर्फ़ इसलिए ताक़ि यह दुनिया भर की बातों से छुटकारा मिल सके। मैं भविष्य के दरवाज़े के भीतर घुसा, तुम्हारी यादों के साथ। अब फिर एक उलझन सामने आ गई। तुम्हारी यादों से बातें करते करते चेहरे पर उदासी आ गई थी। और मेरा भविष्य का कमरा अब वर्तमान का कमरा हो चुका था।